भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११३६ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-
अरुंषिकाकी चिकित्सा ।
अरुंषिकायां रुधिरेऽवसिक्ते शिराव्यधेनाथ जलौकसा वा ।
निम्बाम्बुसिक्ते शिरसि प्रलेपो देयोऽश्ववर्चोरससैन्धवाभ्याम् ॥
अरुंषिकारोगमें प्रथम शिरा वेधकर या जोंकद्वारा रुधिरका निकलवाना, पश्चात् नीमकी छालके अधपके क्वाथसे शिरको सिंचनकर घोडेकी लीदके रस और सैन्धे-नमकको एकत्र मिलाकर लेप करना हितकारी है ॥ ६२ ॥
पुराणमथ पिण्याकं पुरीषं कुक्कुटस्य वा ।
मूत्रपिष्टः प्रलेपोऽयं शीघ्रं हन्यादरुंषिकाम् ॥
अरुंषिघ्नं भृष्टकुष्ठचूर्णं तैलेन संयुतम् ॥ ६३ ॥
तिलकी पुरानी खल अथवा मुर्गेकी विष्ठाको गोमूत्रमें पीसकर लेप करे । या कूठकी भस्मको तिलके तेलमें मिलाकर लगानेसे अरुंषिका दूर होती है ॥ ६३ ॥
त्रिफलाद्यतैल ।
त्रिफलायोरजोयष्टिमार्कवोत्पलशारिवैः ।
ससैन्धवैः पचेत्तैलमभ्यङ्गोऽरुंषिकां जयेत् ॥ ६४ ॥
त्रिफला, लोहभस्म, मुलहठी, भाँगरा, नीलकमल, अनन्तमूल और सेंधानमक इनके कल्कद्वारा विधिपूर्वक तैलको सिद्ध कर मालिश करनेसे अरुंषिकारोग दूर होता है ॥ ६४ ॥
दारुणककी चिकित्सा ।
दारुणे तु शिरां विध्येत्स्निग्धां स्विन्नां ललाटजाम् ।
अवपीडाशिरोवस्तीनभ्यङ्गांश्चावचारयेत् ॥ ६५ ॥
दारुणकरोगमें मस्तककी शिराको स्निग्ध स्वेद देकर छेदन करे । इस रोगमें नस्य, शिरोवस्ति और तैलादिकी मालिश सर्वदा करनी चाहिये ॥ ६५ ॥
कोद्रवाणां तृणक्षारपानीय परिधावने ।
कार्यो दारुणके मूर्ध्नि प्रलेपो मधुसंयुतः ॥ ६६ ॥
कोदोंकी भूसीके क्षारजलसे मस्तकको सिञ्चन करे और उक्त क्षारको शहदमें मिलाकर शिरपर लेप करे । इससे अरुंषिकारोग दूर होता है ॥ ६६ ॥
पियालबीजमधुककुष्ठमाषैः ससैन्धवैः ।
काञ्जिकस्थास्त्रिसप्ताहं माषा दारुणकापहाः ॥ ६७ ॥