भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११३५


कपित्थतिन्दुकप्लक्षवटपत्रैः पयोन्वितैः ।
लेपयेत्कल्कितैरेभिस्तैलं चाभ्यञ्जनं चरेत् ॥ ५६ ॥
विप्लुवं नीलिकाव्यङ्गांस्तिलकान्मुखदूषिकान् ।
नित्यसेवी जयेत्क्षिप्रं मुखं कुर्यान्मनोरमम् ॥ ५७ ॥

हल्दी, दारुहल्दी, मुलहठी, पीलाचन्दन, लालचन्दन, पुण्डरिया, मंजीठ, कमल-पत्र, पद्माख, केशर, कैथके पत्ते, तेंदुके पत्ते, पाखर और बडके पत्ते इनके समान भाग मिश्रित कल्कके द्वारा तिलके तेलको उत्तम प्रकार सिद्ध कर मालिश करे । यह तेल नीलिका, व्यंग तिलकालक और मुखके सब विकारोंको नष्ट करता है । इसको निरन्तर सेवन करनेसे मुख अत्यन्त मनोहर होता है ॥ ५६-५७ ॥

कुंकुमाद्यतैल ।

कुंकुमं किंशुकं लाक्षा मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् ।
कालीयकं पद्मकं च मातुलुङ्गं सकेशरम् ॥ ५८ ॥
कुसुम्भं मधुयष्टी च फलिनी मदयन्तिका ।
निशे द्वे रोचना पद्ममुत्पलं च मनःशिला ॥ ५९ ॥
काकोल्यादिसमायुक्तैरेतैरक्षसमैर्भिषक् ।
लाक्षारसपयोभ्यां च तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ६० ॥
कुंकुमाद्यमिदं तैलमभ्यङ्गात्काञ्चनोपमम् ।
करोति वदनं सद्यः पुष्टिलावण्यकान्तिकम् ॥
सौभाग्यलक्ष्मीजननं वशीकरणमुत्तमम् ॥ ६१ ॥

टेसूके फूल, लाख, मंजीठ, लालचन्दन, पीलाचन्दन, पद्माख, बिजौरेनींबूकी जड, बिजौरे नींबूकी केशर, कसुमके फूल, मुलहठी, फूल प्रियंगू, मदयन्तिका (मल्लिका विशेष), हल्दी, दारुहल्दी, गोरोचन, नीलकमल, मैनसिल और काकोल्यादिगणकी समस्त औषधियाँ इन प्रत्येकको दो दो तोले लेकर एकत्र कूटपीसकर कल्क बनालेवे । इस कल्कको लाखके ४ सेर रस और चार सेर दूधके साथ मिलाकर एक प्रस्थ तिलके तेलको उत्तम प्रकार पकावे । जब पाक सिद्ध होजाय तब उसमें दो तोले नागकेशर मिलादेवे । यह कुंकुमाद्य तेल निरन्तर मालिश करनेसे मुखको सुवर्णकी समान कान्तिमान्, पुष्ट और रूपलावण्यतासे युक्त बनादेता है एवं सौभाग्य और लक्ष्मीकी वृद्धि करता है । यह उत्तम वशीकरण योग है ॥ ५८-६१ ॥