भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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११३४ भैषज्यरत्नावली । [ क्षुद्ररोग-

सफेद सरसों, हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, गेरु, घी और बकरीका दूध इन सबको समानांश ले एकत्र कूट पीसकर लेप करे तो मुख चन्द्रविम्बके समान निर्मल कान्तिपूर्ण होता है ॥ ४९ ॥

परिणतदधिशरपुङ्खैः कुवलयदलकुष्ठचन्दनोशीरैः ।
मुखकमलकान्तिकारी भ्रुकुटीतिलकालकाञ्जयति ॥ ५० ॥

सरफोंका, कमलपत्र, कूठ, लालचन्दन और खस इन सबको दहीके तोडमें पीसकर लेप करे। यह लेप मुखको कमलपत्रके समान सुशोभित करता है और भ्रुकुटिजन्य तथा तिलकालकरोगको जीतता है ॥ ५० ॥

वर्णकघृत ।

मधुकं चन्दनं कङ्गुः सर्षपं पद्मकं तथा ।
कालीयकं हरिद्रा च लोध्रमेभिश्च कल्कितैः ॥ ५१ ॥
विपचेद्धि घृतं वैद्यस्तत्पक्वं वस्त्रगालितम् ।
पादांशं कुङ्कुमं सिक्थं क्षिप्त्वा मन्दानले पचेत् ॥ ५२ ॥
तत्सिद्धं शिशिरे नीरे प्रक्षिप्याकर्षयेत्ततः ।
तदेतद्वर्णकं नाम घृतं वक्त्रप्रसादनम् ॥ ५३ ॥
अनेनाभ्यासलिप्तं हि वलीभूतमपि क्रमात् ।
निष्कलङ्केन्दुबिम्बाभं स्याद्विलासवतीमुखम् ॥ ५४ ॥

मुलहठी, लालचन्दन, मालकाङ्गनी, सरसों, पद्माख, कालाचन्दन, हल्दी और लोध इन सबका कल्क आधसेर, घी दो सेर और पाकके लिये जल ८ सेर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृतको पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उसमें केशर आठ तोले और मोम आठ तोले डालकर दोबारा मन्दमन्द अग्निपर पकावे । जब पकते पकते जल बिलकुल न रहे तब उस घृतपात्रको उतारकर शीतल जलमें रखकर ठंडा करे । इस प्रकार यह वर्णक नामवाला घृत सिद्ध होता है । इसको मुखमें लगानेसे मुखमें प्रसन्नता होती है और वली (झुर्रियोंका पडना) रोग दूर होता है। एवं विलासिनी स्त्रियोंका मुख निर्मल चन्द्रमाकी समान कान्तियुक्त होता है ॥ ५१-५४ ॥

द्विहरिद्राद्यतैल ।

हरिद्राद्वययष्ट्याह्वकालीयककुचन्दनैः ।
प्रपौण्डरीकमञ्जिष्ठापद्मपद्मककुङ्कुमैः ॥ ५५ ॥