भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1185

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५३

चिकित्सासाध्य रोहिणीरोगमें रक्तमोक्षण, वमन, धूमपान, गण्डूष और नस्य इत्यादि प्रयोग करने हितकारी हैं ॥ ४५ ॥

वातिकीं तु हृते रक्ते लवणैः प्रतिसारयेत् ।
सुखोष्णांस्तैलकवलान् धारयेच्चाप्यभीक्ष्णशः ॥ ४६ ॥
वातज रोहिणीमें पहले रक्तमोक्षण कर फिर पञ्चलवण द्वारा घर्षण करे और निरन्तर मन्दोष्ण तेलके कवल धारण करे ॥ ४६ ॥

पत्तङ्गरशर्कराक्षौद्रैः पैत्तिकीं प्रतिसारयेत् ।
द्राक्षापरूषकक्वाथो हितश्च कवलग्रहे ॥ ४७ ॥
पित्तकी रोहिणीमें लालचन्दन, चीनी और शहद इनको एकत्र मिलाकर प्रतिसारण करे। एवं दाख और फालसोंका क्वाथ बनाकर कवल धारण करे ॥

आगारधूमकटुकैः कफजां प्रतिसारयेत् ।
श्वेताविडङ्गदन्तीषु सिद्धं तैलं ससैन्धवम् ॥
नस्यकर्मणि दातव्यं कवलं च कफोच्छ्रये ॥ ४८ ॥
कफजनित रोहिणीरोगमें घरके धुएँ और कुटकीके चूर्णको घिसे । एवं श्वेत अपराजिता, वायविडङ्ग, दन्तीकी जड और सैंधानमक इनके कल्कद्वारा सिद्ध कियाहुआ तेल नस्यकर्ममें और कवलधारण करनेमें प्रयोग करे ॥ ४८ ॥

पित्तवत्साधयेद्वैद्यो रोहिणीं रक्तसम्भवाम् ॥ ४९ ॥
रक्तसे उत्पन्नहुए रोहिणीरोगकी पित्तजरोहिणाके समान चिकित्सा करे ॥

विस्राव्य कण्ठशालूकं साधयेत्तुण्डिकेरीवत् ।
एककालं यवान्नं च भुञ्जीत स्निग्धमल्पशः ॥ ५० ॥
कण्ठशालूकरोगमें अल्प रक्तमोक्षण कराकर तुण्डिकेरीरोगके समान चिकित्सा करे और एक वक्तमें थोडासा जौका बना स्निग्ध अन्न भोजन करे ॥ ५० ॥

उपजिह्विकवच्चापि साधयेदिरिवेल्लिकाम् ॥ ५१ ॥
इरिवेल्लिकारोगकी उपजिह्विकरोगके समान चिकित्सा करे ॥ ५१ ॥

उन्नाम्य जिह्वामाकृष्य बडिशेनाधिजिह्वकम् ।
छेदयेन्मण्डलाग्रेण तीक्ष्णोष्णैर्घर्षणादिभिः ॥ ५२ ॥
अधिजिह्वारोगमें जिह्वाको ऊपरको उठाकर और बडिशयन्त्र (संडासी) से अधिजिह्वाको खींचकर मण्डलाग्रशस्त्रसे छेदन करे । फिर तीक्ष्ण और गरम औषधियोंसे घिसकर थोडासा रक्त निकालकर संशोधनक्रिया करे ॥ ५२ ॥

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