भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1186

११५४ | भैषज्यरत्नावली । | [ मुखरोग-


अमर्मस्थं सुपक्वं च भेदयेद्गलविद्रधिम् ॥ ५३ ॥ गलविद्रधि यदि मर्मस्थानमें न हो तो उसको अच्छे पक्व होनेपर वेध देवे ॥ ५३ ॥

कण्ठरोग असृङ्मोक्षस्तीक्ष्णैर्न स्यादिकर्म च । क्वाथपानं तु दार्वीत्वङ्निम्बताक्ष्यैकलिङ्गतः ॥ ५४ ॥ कण्ठरोगमें रक्तमोक्षण अथवा तीक्ष्ण औषधियोंका नस्य देना चाहिये । फिर दारुहल्दीकी छाल, नीमकी छाल और इन्द्रजौ इनके क्वाथमें रसौतका चूर्ण डालकर पान करावे ॥ ५४ ॥

हरीतकीकषायो वा पेयो माक्षिकसंयुक्तः । कटुकातिविषादारुपाठामुस्तकलिङ्गकाः ॥ गोमूत्रकथिताः पेयाः कण्ठरोगविनाशनाः ॥ ५५ ॥ हरडके क्वाथमें शहद डालकर पान करे अथवा कुटकी, अतीस, देवदारु, पाठ, नागरमोथा और इन्द्रजौ इन सबका गोमूत्रमें यथाविधि क्वाथ बनाकर पान करे । यह क्वाथ कण्ठरोगनाशक है ॥ ५५ ॥

यवाग्रजं तेजवतीं सपाठां रसाञ्जनं दारुनिशां सकृष्णाम् । क्षौद्रेण कुर्याद् गुटिकां मुखेन तां धारयेत्सर्वगलामयेषु ॥ ५६ ॥ जवाखार, चव्य, पाठ, रसौत, दारुहल्दी और पीपल इनके चूर्णको शहदमें खरल करके गोली बनालेवे । फिर उस गोलीको मुखमें धारण करे तो सर्वप्रकारके कण्ठ-रोग दूर होते हैं ॥ ५६ ॥

दशमूलं पिबेदुष्णं यूषं मूलकुलत्थयोः । क्षीरेक्षुरसगोमूत्रदधिमस्त्वम्लकाञ्जिकैः ॥ ५७ ॥ विदध्यात्कवलान्वीक्ष्य दोषं तैलघृतैरपि ॥ ५८ ॥ गलेके रोगमें दशमूलका उष्ण क्वाथ पान करे । एवं मूली और कुलथींका यूष भोजन करे । दोषोंका बलाबल विचारकर दूध, ईखका रस, गोमूत्र, दहीका तोड, खट्टी काँजी तेल और घी इनका कवल धारण करावे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥

सर्वसरमुखरोगकी चिकित्सा।

मूत्रसिक्तां शिवां तुल्यां मधुरीकुष्ठबालकैः । अभ्यस्य मुखरोगांस्तु जयेद्विरसतामपि ॥ ५९ ॥ गोमूत्रमें भावना दीहुई हरड, सौंफ, कूठ और सुगन्धवाला इन औषधियोंको समान भाग लेकर गोमूत्रमेंही क्वाथ बनाकर मुखमें धारण करे तो मुखकी विरसता और सर्वप्रकारके मुखरोग नष्ट होते हैं ॥ ५९ ॥