भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८५
इस चूर्णको दोषोंका बलाबल देखकर उचित मात्रासे प्रयोग करना चाहिये यह भैरवनामक चूर्ण सर्व प्रकारके ज्वरों अर्थात् वातज, पित्तज, कफज, द्वन्द्वज, त्रिदोषज, विषमज्वर, जीर्णज्वर और मानसिक ज्वरको नष्ट करता है तथा प्राकृत, वैकृत, सौम्य, तीक्ष्ण, अन्तर्गत, बहिर्गत निराम, साम इन आठों प्रकारके ज्वरोंको तथा साध्यासाध्य ज्वरोंको भी यह अवश्य दूर करता है तथा अनेक देशोंके जलवायुके दोषसे उत्पन्न हुए और विरुद्ध औषधियोंको सेवन करनेसे उत्पन्नहुए ज्वरोंको शीघ्र नष्ट करता है एवं मन्दाग्नि, यकृत् विकार, प्लीहावृद्धि, पाण्डुरोग, अरुचि, उदरसम्बन्धीरोग, अन्त्रवृद्धि, रक्तपित्त, त्वचाके रोग, सूजन, शिरकी पीडा और सर्व प्रकारके वातरोगोंको भी नष्ट करता है। इस उत्तम, चूर्णको श्रीभैरवाचार्यने निर्माण किया है ॥ १७-२२ ॥
ज्वरनागमयूरचूर्ण ।
लौहाभ्रटङ्कणं ताम्रं तालकं वङ्गमेव च ।
शुद्धसूतं गन्धकं च शिग्रुबीजं फलत्रिकम् ॥ २३ ॥
चन्दनातिविषा पाठा वचा च रजनीद्वयम् ।
उशीरं चित्रकं देवकाष्ठं च सपटोलकम् ॥ २४ ॥
जीवकर्षभकाजाज्यस्तालीशं वंशलोचना ।
कण्टकार्याः फलं मूलं शठी पत्रं कटुत्रयम् ॥ २५ ॥
गुडूचीसत्त्वधन्याकं कटुकाक्षेत्रपर्पटी ।
मुस्तकं बालकं बिल्वं यष्टीमधु समं समम् ॥ २६ ॥
भागाच्चतुर्गुणं देयं कृष्णजीरस्य चूर्णकम् ।
तत्समं तालपुष्पं च चूर्णं दण्डोत्पलाभवम् ॥ २७ ॥
कैरातं तत्समं देयं तत्समं चपलाभवम् ।
एतच्चूर्णं समाख्यातं ज्वरनागमयूरकम् ॥ २८ ॥
लोहभस्म, अभ्रकभस्म, सुहागा, ताम्रभस्म, हरतालभस्म, वंगभस्म, शुद्ध पारद, और शुद्ध गन्धककी कज्जली, सहिंजनेके बीज, त्रिफला, लालचन्दन, अतीस, पाठ, बच, दारुहल्दी, हल्दी, खस, चीतेकी जड, देवदारु, पटोलपात, जीवक, ऋषभक, कालाजीरा, तालीसपत्र, वंशलोचन, कटेरीके फल, कटेरीकी जड, कचूर, तेजपात, त्रिकुटा, गिलोयका सत्व, धनियाँ, कुटकी, पित्तपापडा, नागरमोथा, सुगन्धवाला, बेलकी छाल और मुलहठी इन सब औषधियोंको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण