भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८६ | भैषज्यरत्नावली । | [ चूर्णप्र० ] |
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करके कपडेम छानलेवे। फिर इस चूर्णमें कालेजीरेका चूर्ण, ताडकी जटाओंका क्षार, श्वेतदण्डोत्पल, चिरायता और भाँग इन प्रत्येकका चूर्ण उपर्युक्तचूर्णसे चौगुना मिलाकर शीशीमें भरकर रखदेवे। इसको ज्वरनागमयूरचूर्ण कहते हैं ॥ २३-२८ ॥
प्रतिमाषमितं खाद्यं युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ।
सन्ततादिज्वरं हन्ति साध्यासाध्यं न संशयः ॥ २९ ॥
क्षयोद्भवं च धातुस्थं कामशोकोद्भवं ज्वरम् ।
भूतावेशज्वरं चैवमभिचारसमुद्भवम् ॥ ३० ॥
दाहशीतज्वरं घोरं चातुर्थ्यादिविपर्ययम् ।
जीर्णं च विषमं सर्वं प्लीहानमुदरं तथा ॥ ३१ ॥
कामलां पाण्डुरोगं च शोथं हन्ति न संशयः ।
भ्रमं तृष्णां च कासं च शूलानाहौ क्षयं तथा ॥ ३२ ॥
यकृतं गुल्मशूलं च आमवातं निहन्ति च ।
त्रिकपृष्ठ कटी जानुपार्श्वानां शूलनाशनम् ॥
अनुपानं शीतजलं न देयमुष्णवारिणा ॥ ३३ ॥
इस चूर्णको प्रतिदिन एक-एक माशा परिमाण अथवा दोषोंके बलाबलके अनुसार मात्रामें युक्तिपूर्वक न्यूनाधिकता करके सेवन करे। इसपर शीतलजलका अनुपान करे, उष्ण जलका इसपर कदापि अनुपान न करे। यह चूर्ण साध्य अथवा असाध्य सन्तत आदि ज्वर, क्षयोत्पन्नज्वर, धातुगत अथवा काम शोकादिसे उत्पन्नहुए ज्वर, भूतबाधा या अभिचार आदिजन्यज्वर, घोर दाह और शीतयुक्त-ज्वर, चातुर्थिकज्वर, जीर्णज्वर, सब प्रकारके विषमज्वर तथा प्लीहा रोग, उदर-रोग, कामला, पाण्डुरोग, शोथ, भ्रम, तृषा, खाँसी, शूल, आनाह, क्षय, यकृत्-रोग, गुल्मशूल, आमवात एवं त्रिकस्थान, पृष्ठवंश, कमर, जानु और पार्श्वभाग (पसली) इन स्थानोंकी पीडा इत्यादि समस्त रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २९-३३ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां चूर्णप्रकरणम् ।