भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ८७


अथ रसप्रकरणम् ।

नवज्वरआदिमें रसोंका प्रयोग ।

न दोषाणां न रोगाणां न पुंसां च परीक्षणम् ।
न देशस्य न कालस्य कार्यं रसचिकित्सिते ॥ १ ॥

रसद्वारा चिकित्सा करनेपर वातादिदोष, रोग, रोगी मनुष्य, देश और काल इनका कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो न जानाति रसं यथा ।
सर्वं तस्योपहासाय धर्महीनो यथा बुधः ॥ २ ॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मको भलीभाँति जानता है, किन्तु रसचिकित्सासे अनभिज्ञ है, वह धर्महीन पण्डितके समान हास्यास्पद होता है ॥ २ ॥

अनुपानै रसा योज्या देशकालानुसारिभिः ।
दोषघ्नैर्मधुना वापि केवलेन जलेन वा ॥ ३ ॥

रसादि ओषधियोंको देश, काल, पात्र और दोषोंके बलाबलके अनुसार दोषनाशक द्रव्योंके अनुपानके साथ अथवा शहद या केवल शीतल जलके अनुपानसे सेवन करना चाहिये ॥ ३ ॥

ये रसाः पित्तसंयुक्ताः प्रोक्ताः सर्वत्र शम्भुना ।
जलसेकावगाहाद्यैर्बलिनस्ते तु नान्यथा ॥ ४

जो रस मत्स्य आदिके पित्तकी भावना देकर सिद्ध किये हैं, उनके सेवन करनेके पश्चात् जलसेचन ( जलका सींचना ) और अवगाहन ( नदी आदिमें स्नान करना ) आदि क्रियाओंके करनेसे उनके गुण बढजाते हैं और इन क्रियाओंके न करनेसे वे रस प्रायः गुणहीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥

रसजनितविदाहे शीततोयाभिषेको
मलयजघनसारालपनं मन्दवातः
तरुणदधि सिताढ्यं नारिकेलीफ़लाम्भो
मधुरशिशिरपानं शीतमन्यच्च शस्तम् ॥ ५ ॥

रसोंके सेवनसे दाह उत्पन्न होनेपर शरीरपर शीतलजलका अभिषेक, श्रीखण्ड, चन्दन, कपूर आदिका प्रलेप, शीतल मन्द वायुका सेवन, मिश्री मिलाकर ताजे दधिका