भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८८ | भैषज्यरत्नावली । | [ रस- |
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सेवन, नारियलके कच्चेफलका जलपान, मधुर और शीतल ऐसे पदार्थोंका सेवन और इसी प्रकार अन्यान्य शीतोपचार करने उपयोगी हैं ॥ ५ ॥
हिंगुलेश्वर ।
तुल्यांशं मर्दयेत्खल्वे पिप्पलीं हिङ्गुलं विषम् ।
द्विगुञ्जा मधुना देया वातज्वरनिवृत्तये ॥ ६ ॥
पीपल, सिंगरफ और शुद्ध मीठा तेलिया इन तीनोंको समान भाग लेकर खरलमें डालकर जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली शहदके साथ देनेसे वातजज्वर निवृत्त होता है ॥ ६ ॥
बृहद्धिंगुलेश्वर ।
हिङ्गुलं च विषं व्योषं टङ्कणं नागगाह्वयम् ।
जयपालसमायुक्तं सद्योज्वरविनाशनम् ॥ ७ ॥
शुद्ध सिंगरफ, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, सुहागा, सोंठ और जमालगोटा सबको समानभाग लेकर जलके योगसे खरलकरके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको शीतलजलके अनुपानसे सेवन करनेपर नवीनज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ७ ॥
शीतभंजीरस ।
रसहिङ्गुलगन्धं च जैपालं सम्मितं त्रिभिः ।
दन्तीक्वाथेन सम्मर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ ८ ॥
आर्द्रकस्वरसेनाथा दापयेद्रक्तिकाद्वयम् ।
नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ ९ ॥
शर्करादधिभक्तं च पथ्यं देयं प्रयत्नतः ।
शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुर्मुद्गरसो हितः ॥
शीतभञ्जी रसो नाम्ना सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ १० ॥
पारा, गन्धक और सिंगरफ ये प्रत्येक एक तोला और शुद्ध जमालगोटा तीन तोले लेकर सबको दन्तीके क्वाथके साथ खूब खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके स्वरसके या मधुके साथ देनेसे सब प्रकारका नवीन ज्वर दूर होता है । यह रस अत्यन्त भयंकर नवीनज्वरको एक प्रहरमें ही दूर करदेता है । इस रसको सेवन करनेके पश्चात् दही और मिश्री मिलाकर भातका पथ्य देना चाहिये तथा इसपर शीतलजल, ईखका रस तथा मूँगका यूष-पान