भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११५६ भैषज्यरत्नावली । [ मुखरोग-
स्वरसः कथितो दार्व्या घनीभूतो रसक्रिया ।
सक्षौद्रा मुखरोगासृग्दोषनाडीव्रणापहा ॥ ६७ ॥
दारुहल्दीके स्वरसका गाढा २ क्वाथ बनाकर मधुमिश्रित कर मुखमें धारण कर-नेसे मुखरोग, रक्तप्रदर और नाडीव्रणरोग नष्ट होते हैं ॥ ६७ ॥
क्वथितास्त्रिफलापाठामृद्वीकाजातिपल्लवाः ।
निषेव्या भक्षणीया वा त्रिफला मुखपाकहा ॥ ६८ ॥
हरड, बहेडा, आमला, पाठ, दाख, और चमेलीके पत्ते इनका क्वाथ बनाकर पान करे । अथवा त्रिफलेकी औषधियोंको सम भाग लेकर एकत्र पीसकर भक्षण करे तो मुखपाकरोग दूर होता है ॥ ६८ ॥
कृष्णाजीरककुष्ठेन्द्रयवचर्वणत्र्यहम् ।
मुखपाकव्रणक्लेददौर्गन्ध्यमुपशाम्यति ॥ ६९ ॥
पीपल, जीरा, कूठ और इन्द्रजौ इन सबको एकत्र मिलाकर चर्वण करनेसे तीन-दिनमेंही मुखपाक, व्रण, क्लेद और मुखकी दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ ६९ ॥
तिलं नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च ।
सक्षौद्रो दग्धवक्त्रस्य गण्डूषो दाहपाकहा ॥
मुख जल गया हो तो तिलोंका क्वाथ, नीलकमलका क्वाथ, घृत, चीनी अथवा दूध इनमें शहद डालकर कुल्ले करे । इससे मुखकी दाह और पाक दूर होता है ॥
तैलेन काञ्जिकेनाथ गण्डूषश्चूर्णदाहहा ॥ ७० ॥
तिलके तेलका अथवा काँजीका गण्डूष धारण करनेसे अधिक चूनेके खानेसें उत्पन्नहुई दाह शान्त होती है ॥ ७० ॥
घनकुष्ठैलाधान्यकयष्टीमध्वेलवालुकाकवलः ।
वदनेऽतिपूतिगन्धं हरति सुरालशुनगन्धं च ॥ ७१ ॥
नागरमोथा, कूठ, छोटी इलायची, धनियाँ, मुलहठी, और एलुआ इनके क्वाथका कवल धारण करनेसे मुखकी दुर्गन्ध और मद्यपान तथा लहसुन खानेसे उत्पन्न हुई दुर्गन्ध तत्क्षण दूर होतीहै ॥ ७१ ॥
सप्तच्छदादि ।
सप्तच्छदोशीरपटोलमुस्तहरीतकीतिक्तकरोहिणीभिः ।
यष्ट्याह्नराजद्रुमचन्दनैश्चक्वाथं पिबेत्पाकहरं मुखस्य॥७२॥