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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

११५६ भैषज्यरत्नावली । [ मुखरोग-


स्वरसः कथितो दार्व्या घनीभूतो रसक्रिया ।
सक्षौद्रा मुखरोगासृग्दोषनाडीव्रणापहा ॥ ६७ ॥
दारुहल्दीके स्वरसका गाढा २ क्वाथ बनाकर मधुमिश्रित कर मुखमें धारण कर-नेसे मुखरोग, रक्तप्रदर और नाडीव्रणरोग नष्ट होते हैं ॥ ६७ ॥

क्वथितास्त्रिफलापाठामृद्वीकाजातिपल्लवाः ।
निषेव्या भक्षणीया वा त्रिफला मुखपाकहा ॥ ६८ ॥
हरड, बहेडा, आमला, पाठ, दाख, और चमेलीके पत्ते इनका क्वाथ बनाकर पान करे । अथवा त्रिफलेकी औषधियोंको सम भाग लेकर एकत्र पीसकर भक्षण करे तो मुखपाकरोग दूर होता है ॥ ६८ ॥

कृष्णाजीरककुष्ठेन्द्रयवचर्वणत्र्यहम् ।
मुखपाकव्रणक्लेददौर्गन्ध्यमुपशाम्यति ॥ ६९ ॥
पीपल, जीरा, कूठ और इन्द्रजौ इन सबको एकत्र मिलाकर चर्वण करनेसे तीन-दिनमेंही मुखपाक, व्रण, क्लेद और मुखकी दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ ६९ ॥

तिलं नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च ।
सक्षौद्रो दग्धवक्त्रस्य गण्डूषो दाहपाकहा ॥
मुख जल गया हो तो तिलोंका क्वाथ, नीलकमलका क्वाथ, घृत, चीनी अथवा दूध इनमें शहद डालकर कुल्ले करे । इससे मुखकी दाह और पाक दूर होता है ॥

तैलेन काञ्जिकेनाथ गण्डूषश्चूर्णदाहहा ॥ ७० ॥
तिलके तेलका अथवा काँजीका गण्डूष धारण करनेसे अधिक चूनेके खानेसें उत्पन्नहुई दाह शान्त होती है ॥ ७० ॥

घनकुष्ठैलाधान्यकयष्टीमध्वेलवालुकाकवलः ।
वदनेऽतिपूतिगन्धं हरति सुरालशुनगन्धं च ॥ ७१ ॥
नागरमोथा, कूठ, छोटी इलायची, धनियाँ, मुलहठी, और एलुआ इनके क्वाथका कवल धारण करनेसे मुखकी दुर्गन्ध और मद्यपान तथा लहसुन खानेसे उत्पन्न हुई दुर्गन्ध तत्क्षण दूर होतीहै ॥ ७१ ॥

सप्तच्छदादि ।
सप्तच्छदोशीरपटोलमुस्तहरीतकीतिक्तकरोहिणीभिः ।
यष्ट्याह्नराजद्रुमचन्दनैश्चक्वाथं पिबेत्पाकहरं मुखस्य॥७२॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११५७

सतौनेकी छाल, खस, परवल, नागरमोथा, हरड, कुटकी, मुलहठी, अमलतास और लालचन्दन इनका क्वाथ बनाकर पान करे तो मुखपाकरोग आराम होता है ॥ ७२ ॥

पटोलादि ।

पटोलशुण्ठीत्रिफलाविशालात्रायन्तितिक्ताद्विनिशामृतानाम् । पीतः कषायो मधुना निहन्ति मुखे स्थितश्चास्यगदानशेषान् ॥ ७३ ॥

पटोलपात, सोंठ, त्रिफला, इन्द्रायणकी जड, त्रायमाण, कुटकी, हल्दी, दारुहल्दी और गिलोय इनके क्वाथको मधुके साथ मिश्रितकर पान करनेसे अथवा मुखमें धारण करनेसे मुखके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ७३ ॥

कालकचूर्ण ।

गृहधूमो यवक्षारः पाठा व्योषं रसाञ्जनम् । तेजोह्वा त्रिफला लौहं चित्रकं चेति चूर्णितम् ॥ सक्षौद्रं धारयेदेतद्गलरोगविनाशनम् । कालकं नाम तच्चूर्णं दन्तास्यगलरोगनुत् ॥ ७४ ॥

घरका धुआँ, जवाखार, पाठ, त्रिकुटा, रसौत, चव्य, त्रिफला, लोहा और चीता इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको शहदमें मिलाकर मुखमें धारण करे तो यह कालकचूर्ण गलेके, दाँतोंके और मुखके सम्पूर्ण विकारोंको नष्ट कर देता है ॥

पीतकचूर्ण ।

मनःशिला यवक्षारो हरितालं ससैन्धवम् । दार्बीत्वक् चेति तच्चूर्णं माक्षिकेण समायुतम् ॥ ७५ ॥ मूर्च्छितं घृतयोगेन कण्ठरोगेषु धारयेत् । मुखरोगेषु च श्रेष्ठं पीतकं नामकीर्तितम् ॥ ७६ ॥

मैनासिल, जवाखार, हरिताल, सेंधानमक और दारुहल्दीकी छाल इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहद और घृतमें मिलाकर मुखमें धारण करे । यह पीतकनामवाला चूर्ण कण्ठरोगमें और मुखरोगमें अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥

दशनसंस्कारचूर्ण ।

शुण्ठी हरीतकी मुस्ता खदिरं घनसारकम् । गुवाकभस्म मरिचं देवपुष्पं तथा त्वचम् ॥ ७७ ॥

११९८भैषज्यरत्नावली ।[ मुखरोग-

एतेषां समभागेन चूर्णमेव विनिर्दिशेत् ।
तत्समं प्रक्षिपेत्तत्र चूर्णं कठिनसम्भवम् ॥
एतद्दशनसंस्कारचूर्णं दन्तास्यरोगजित् ॥ ७८ ॥

सोंठ, हरड, नागरमोथा, खैर, कपूर, सुपारीकी भस्म, मिरच, लौंग और दारचीनी इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णकी बराबर उसमें खडियामिट्टी मिलालेवे । यह दशनसंस्कारचूर्ण है । इसको प्रतिदिन दाँतोंमें मलनेसे दन्तरोग और मुखरोग शीघ्र दूर होते हैं ॥ ७७ ॥ ७८ ॥

दन्तरोगाशनिचूर्णं ।

जातीपत्रपुनर्नवा तिलकणा कौरण्टमुस्ता वचा
शुण्ठी दीप्यहरीतकी च सघृतं चूर्णं मुखे धारयेत् ॥
वातघ्नं कृमिकण्डुशूलदहनं सर्वामयध्वंसनं
दौर्गन्ध्यादिसमस्तदोषहरणं दन्तस्य रोगाशनिः ॥ ७९ ॥

चमेलीके पत्ते, पुनर्नवा, तिल, पीपल, पीलीकटसरैयाके पत्ते, नागरमोथा, वच, सोंठ, अजवायन और हरड इनके चूर्णको समान भाग लेकर घृतमें मिश्रित कर मुखमें धारण करे । इससे वातजदन्तरोग, दाँतोंके कीडे, खुजली, शूल, दाह और मुखकी दुर्गन्धप्रभृति जितने दन्तसम्बन्धी रोग हैं वे सब ध्वंस हो जाते हैं । यह चूर्ण दन्तरोगके लिये वज्रके समान है ॥ ७९ ॥

क्षारगुटिका ।

पञ्चकोलकतालीशपत्रैलामरिचत्वचः ।
पलाशमुष्ककक्षारयवक्षाराश्च चूर्णिताः ॥ ८० ॥
गुडे पुराणे क्वथिते द्विगुणे गुडिकाः कृताः ।
कर्कन्धुमात्राः सप्ताहं स्थिता मुष्ककभस्मनि ॥
कण्ठरोगेषु सर्वेषु धार्याः स्युरमृतोपमाः ॥ ८१ ॥

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, तालीसपत्र, तेजपात, इलायची, मिरच, दारचीनी, ढाकका खार, मोखावृक्षका खार और जवाखार इनके चूर्णको समान भाग लेवे और समस्त चूर्णसे दुगुना पुराना गुड लेवे । सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर पाक करे । जब पाक पूर्ण होजाय तब उतारकर बेरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको मोखावृक्षकी भस्ममें मिलाकर रख देवे । फिर सात दिनके बाद निकालकर उन गोलियोंको सर्व प्रकारके कण्ठरोगमें

चिकित्सा [ ] भाषाटीकासहिता । ११५९


व्यवहार करें। यह गुटिका उक्त रोगमें अमृतके समान गुणकारी है ॥ ८० ॥ ८१ ॥

स्वल्पखदिरवटिका।

खदिरस्य तुलां सम्यक् जलद्रोणे विपाचयेत् ।
शेषेऽष्टभागे तत्रैव प्रतिवापं प्रदापयेत् ॥ ८२ ॥
जातीकर्पूरपूगानि कङ्कोलफलानि च ।
इत्येषा गुडिका कार्या मुखसौभाग्यवर्द्धिनी ॥
दन्तौष्ठमुखरोगेषु जिह्वाताल्वामयेषु च ॥ ८३ ॥

खैरको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर आठवाँ भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस क्वाथको दुबारा चूल्हेपर चढा-कर मन्दमन्द अग्निसे पकावे। पकते पकते जब वह गाढा पडजाय तब उसमें जावित्री, कपूर, सुपारी, काकोली और जायफल इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले डालकर सबको अच्छे प्रकार मिलाकर गोलियाँ बनालेवे। यह वटी मुखमें धारण करनेसे मुखकी शोभाको बढाती है एवं दन्त, ओष्ठ, मुख, जिह्वा और तालु आदि सब मुखरोगोंमें विशेष हितकारी है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥

बृहत्खदिरवटिका।

गायत्रिसारतुलमेरिमवल्कलानां सार्द्धं तुलायुगलमम्बु-
घटैश्चतुर्भिः । निःक्वाथ्य पादमवशिष्टसुवस्त्रपूतं भूयः
पचेदथ शनैर्मृदुपावकेन ॥ ८४ ॥ तस्मिन्घनत्व-
मुपगच्छति चूर्णमेषां श्लक्ष्णं क्षिपेच्च कवलग्रहभागिका-
नाम्।एलामृणालसितचन्दनचन्दनाम्बुश्यामातमाल-
विकषाघनलौहयष्टी ॥ ८५ ॥ लज्जाफलत्रयरसाञ्जन-
धातकीनां श्रीपुष्पगैरिककटङ्कट्कट्फलानाम्। पद्माह्व-
लोध्रवटरोहयवासकानां मांसीनिशासुरभिवल्कलसंयु-
तानाम् ॥ ८६ ॥ कक्कोलजातिफलकोषलवङ्गकानि
चूर्णीकृतानि विदधीत पलांशिकानि । शीतेऽवतार्य-
घनसारचतुःपलं च क्षिप्त्वा कलायसदृशीर्गुडिकाः
प्रकुर्यात्॥८७॥शुष्का मुखे विनिहिता विनिवारयन्ति

११६० भैषज्यरत्नावली । [ मुखरोग-

रोगान् गलोष्ठरसनाद्विजतालुजातान् । कुर्य्यान्मुखे सुर- भितां पटुतां रुचिं च स्थैर्य्यं परं दशनगं रसनालघुत्वम् ॥ ८८ ॥

खैरसार १०० पल और दुर्गन्ध खैरकी छाल २५० पल लेकर इनको चार द्रोण जलमे पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इसको दुबारा मृदु अग्नि द्वारा पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा हो जाय तब उसमें छोटी इलायची, खस, सफेद चन्दन, लालचन्दन, सुगन्धवाला, सारिवा, तमालवृक्षकी छाल, मंजीठ, नागरमोथा, अगर, मुलहठी, वराहक्रान्ता, त्रिफला, रसौत, धायके फूल, लौंग, गेरू, दारुहल्दी, कायफल, पद्माख, लोध, बडके अंकुर, धमासा, बालछड, हल्दी, कुन्दुरुनामक गन्धद्रव्य और दारचीनी ये प्रत्येक दो दो तोले एवं शीतलचीनी, जायफल, जावित्री और लौङ्ग इन सब औषधियोंको आठ आठ तोले लेकर खूब बारीक कूटपीसकर डालदेवे । पश्चात् नीचे उतारकर सबको एकमएक करलेवे और शीतल होनेपर चार पल कपूर डालकर मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । फिर इन गोलियोंको सुखाकर मुखमें धारण करे तो ये गोलियाँ गलरोग, ओष्ठरोग, जिह्वारोग, दन्तरोग, तालुरोग तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके मुखरोगोंको नष्ट करती हैं । एवं मुखमें सुगन्धि, पटुता, रुचि, दाँतोंमें दृढता और जिह्वामें हल्कापन उत्पन्न करती हैं ॥ ८४-८८

मुखरोगहररस ।

रसगन्धौ समौ ताभ्यां द्विगुणं च शिलाजतु । गोमूत्रेण विमर्द्याथ सप्तधाऽर्कद्रवेण च ॥ जातीनिम्बमहाराष्ट्रीरसैः सिध्यति पाकहा ॥ ८९ ॥

पारे और गन्धककी कज्जली २ तोले और शिलाजीत ४ तोले इन दोनोंको गोमूत्र, आकके पत्तोंके रस, चमेलीके पत्तों नीमके पत्तोंके रस और जलपीपलके क्वाथमें यथाक्रम ७-७ बार खरल करके ८-८ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ८९ ॥

कणामधुयुता हन्ति मुखपाकं सुदारुणम् । अष्टगुञ्जा धृता वक्त्रे सद्यो हन्ति वटी गदान् ॥ ९० ॥ महाराष्ट्रियाश्च कल्केन मुखं च प्रतिसारयेत् । धारणात्सेवनादेव वटी हन्ति मुखामयान् ॥ ९१ ॥

यह वटी पीपलके चूर्ण और शहदमें मिश्रितकर मुखमें धारण करनेसे अथवा भक्षण करनेसे दारुण मुखपाकरोगको तत्काल नष्ट करती है । इसके।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६१


सेवन करनेके पश्चात् जलपीपलके कल्कसे मुखको अच्छेप्रकार घर्षण करे तो मुखकें सब रोग दूर होते हैं ॥ ९० ॥ ९१ ॥

महासहचरतैल ।

तुलां धृतां नीलसहाचरस्य द्रोणेऽम्भसः संश्रपयेद्यथावत् ।
पूते चतुर्भांगरसे तु तैलं पचेच्छनैर्द्धर्द्धपलप्रमाणैः ॥ ९२ ॥
कल्कैरनन्ताखदिरेरिमेदजम्ब्वाम्रयष्टीमधुकोत्पलानाम् ।
तत्तैलमाश्वेव धृतं मुखेन स्थैर्य्यं द्विजानां विदधाति सद्यः ॥ ९३ ॥

नीलीकटसरैयाको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें यथाविधि पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तेल दो सेर एवं अनन्तमूल,खैरसार, दुर्गन्ध खैरकी छाल, जामुनकी छाल, आमकी छाल, मुलहठी और नीलकमल इन औषधियोंके दो दो तोले प्रमाण कल्कको डालकर उत्तम प्रकार तेलको सिद्ध करे । इस तेलको मुखमें धारण करनेसे तत्काल दाँतोंकी जडें दृढ होजाती हैं ॥९२॥९३॥

बकुलाद्यतैल ।

बकुलस्य फलं लोध्रं वज्रवल्ली कुरुण्टकम् ॥
चतुरङ्गुलबब्बोलवाजिकर्णैरिमासनम् ॥ ९४ ॥
एषां कषायकल्काभ्यां तैलं पक्वं मुखे धृतम् ।
स्थैर्य्यं करोति चलतां दन्तानां धावनेन च ॥९५॥

मौलसिरीके फल, लोध, हडसंहारी, नीली कटसरैया, अमलतास, बबूलकी छाल, शालवृक्षकी छाल, दुर्गन्ध खैरकी छाल, और विजयसार इनके क्वाथ और कल्कके द्वारा विधिपूर्वक तेलको सिद्ध करके मुखमें धारण करे अथवा नास लेवे तो यह तेल हिलतेहुए दाँतोंको शीघ्र स्थिर करदेता है ॥९४॥९५॥

मुखरोगमें पथ्य ।

स्वेदो विरेको वमनं गण्डूषः प्रतिसारणम् ।
कवलोऽसृक्स्रुतिर्नस्यं धूमः शस्त्राग्निकर्मणी ॥ ९६ ॥
तृणधान्यं यवा मुद्गाः कुलत्था जाङ्गला रसाः ।
बृहत्प्रोष्ठी कारवेल्लं पटोलं बालमूलकम् ॥ ९७ ॥
कर्पूरनीरं ताम्बूलं तप्ताम्बु खदिरो घृतम् ।
कटु तिक्तं च वर्गोऽयं मित्रं स्यान्मुखरोगिणाम् ॥ ९८ ॥

११६२भैषज्यरत्नावली ।[ कर्णरोग-

स्वेद, विरेचन, वमन, गण्डूष, मुखमें घर्षण और कवल धारण करना, रुधिर निकलवाना, नस्य, धूमपान, शस्त्रक्रिया, अग्निकर्म करना, तृणधान्य ( धान्यविशेष ) पुराने जौ, मूँग, कुलथी, जङ्गली जीवोंका मांसरस, शफरीमछली, करेला, परवल, कच्चीमूली, अर्ककपूर, ताम्बूल, गरम जल, खैर, घृत, चरपरे और कडुवे द्रव्य यह सब द्रव्यसमूह मुखरोगवाले मनुष्योंको हितकर हैं ॥९६-९८॥

मुखरोगमें अपथ्य ।

दन्तकाष्ठं स्नानमम्लं मत्स्यमानूपमामिषम् ॥
दधि क्षीरं गुडं माषं रूक्षान्नं कठिनाशनम् ॥ ९९ ॥
अधोमुखेन शयनं गुर्वभिष्यन्दकारि च ।
मुखरोगेषु सर्वेषु दिवानिद्रां विवर्जयेत् ॥ १०० ॥

सर्वप्रकारके मुखरोगमें दातौन और स्नान करना, खट्टे पदार्थ, मछली, अनूपदेशीय प्राणियोंका मांस, दही, दूध, गुड, उडद, रूखा अन्न, कठिन भोजन, नीचेको मुँहकरके सोना, गुरुपाकी और कफकारी पदार्थ एवं दिनमें सोना इन सबको दन्तरोगी तत्काल त्याग देवे ॥९९॥१००॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां मुखरोगचिकित्सा ॥


कर्णरोगकी चिकित्सा ।

कपित्थमातुलुङ्गाम्लशृङ्गवेररसैः शुभैः ।
सुतोष्णैः पूरयेत्कर्णं कर्णशूलोपशान्तये ॥ १ ॥

कैथ, बिजौरे नींबूका रस, काँजी अथवा अदरखका रस इनमेंसे किसी एककों कुछ गरम करके कानमें डालनेसे कानकी पीडा दूर होती है ॥ १ ॥

शृङ्गवेरं च मधु च सैन्धवं तैलमेव च ।
कदुष्णं कर्णयोर्धार्यमेतत्स्याद्वेदनापहम् ॥ २ ॥

अदरखका रस, शहद, सेंधानमक और तिलका तेल इनको एकत्र पकाकर सुहाता २ कानोंमें डाले तो कानकी पीडा नष्ट होती है ॥ २ ॥

लशुनाईकशिग्रूणां सुरङ्गया मूलकस्य च ।
कदल्याः स्वरसः श्रेष्ठः कदुष्णः कर्णपूरणे ॥
समुद्रफेनचूर्णेन युक्त्या वाप्यवचूर्णयेत् ॥ ३ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६३


लहसुन, अदरक, सफेद सहिंजना, कच्चीमूली और केलेका स्वरस इनमेंसे किसी एकके रसको मन्दोष्णकर अथवा समुद्रफेनका चूर्ण कानमें पूरनेसे कर्णरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥

आर्द्रकसूर्यावर्त्तकशोभाञ्जनमूलकस्वरसाः ।
मधुतैलसैन्धवयुताः पृथगुक्ताः कर्णशूलहराः ॥ ४ ॥
अदरख, हुलहुल, सहिंजना अथवा कच्चीमूली इनमेंसे किसीके रसको शहद तेल और सेंधेनमकके साथ यथाक्रम मिलाकर कानमें डाले । ये प्रयोग कर्णशूलको हरनेवाले हैं ॥ ४ ॥

शोभाञ्जनस्य निर्यासस्तिलतैलेन संयुतः ।
व्यक्तोष्णः पूरणः कर्णे कर्णशूलोपशान्तये ॥ ५ ॥
सहिंजनेके क्वाथको तिलके तेलमें मिलाकर सुहाता सुहाता कानमें डालनेसे कर्णशूल शान्त होता है ॥ ५ ॥

अष्टानार्माप मूत्राणां मूत्रेणान्यतमेन च ।
कोष्णेन पूरयेत्कर्णौ कर्णशूलोपशान्तये ॥ ६ ॥
कर्णशूलको शान्तकरनेके लिये हाथी, घोडा, ऊँट, भेड, बकरी, गधा, गौ और भैंस इनमेंसे किसी एकके मूत्रको कुछ गरम करके कानमें डाले ॥ ६ ॥

अश्वत्थपत्रखल्लं वा विधाय बहुपत्रकम् ।
तैलाक्तमङ्गारपूर्णं निदध्याच्छ्रवणोपरि ॥ ७ ॥
यत्तैलं च्यवते तस्मात्खल्लादङ्गारतापितात् ।
तत्प्राप्तं श्रवणश्रोतः सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ॥ ८ ॥
पीपलके बहुतसे पत्ते लेकर उनका छिद्रविशिष्ट एक दोना बनावे । उसमें तेलको भरकर उसपर जलता हुआ अङ्गार रक्खे और उस दोनेको कानके छिद्रपर रख-देवे । जिससे अग्निके तापसे तपाहुआ दोनेसे टपकताहुआ तेल बूंदकर कानमें गिराताजाय । इस बूंदसे वेदना तत्काल नष्ट होजाती है ॥ ७ ॥ ८ ॥

अर्कपत्रपुटे दग्धस्नुहीपत्रोद्भवो रसः ।
कदुष्णः पूरणादेव कर्णशूलनिवारणः ॥ ९ ॥
आकके पत्तोंके दोनेमें थूहरके पत्तोंका रस दग्धकर सुहाता २ कानमें डाल-नेसे कानका दर्द दूर होता है ॥ ९ ॥

११६४भैषज्यरत्नावली ।[ कर्णरोग-

अर्कस्य पत्रं परिणामपीतमाज्येन लिप्तं शिखिनाऽवतप्तम् आपीड्य तोयं श्रवणे निषिक्तं निहन्ति शूलं बहुवेदनं च ॥१०॥ पकेहुए आकके पत्तेको घीसे ल्हेसकर अग्निमें गरमकर उसके रसको निकाले । उस रसको कानमें डालनेसे कर्णशूल और अत्यन्त पीडा नष्ट होती है ॥ १० ॥

तीव्रशूलातुरे कर्णे सशब्दे क्लेदवाहिनि । बस्तमूत्रं क्षिपेत्कोष्णं सैन्धवेनावचूर्णितम् ॥ ११ ॥ बकरेके मूत्रको सैंधेनमकके चूर्णके साथ मिलाकर कुछ एक गरम करके कानमें डाले । इससे कानकी तीव्रपीडा, शब्दका होना, पीवका बहना आदि कर्णरोगोंमें शीघ्र लाभ होता है ॥ ११ ॥

हिङ्गुतुम्बुरुशुण्ठीभिः साध्यं तैलं तु सार्षपम् । कर्णशूले प्रधानं तु पूरणं हितमुच्यते ॥ १२ ॥ हींग, धनियाँ और सोंठ इनके कल्क और चौगुने जलके साथ सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकावे । यह तेल कानमें डालनेसे कर्णशूलको दूर करता है ॥१२॥

कर्णनादे कर्णक्ष्वेडे कटुतैलेन पूरणम् । नादबाधिर्ययोः कुर्याद्वातशूलोक्तमौषधम् ॥ १३ ॥ कर्णनाद और कर्णक्ष्वेडरोगमें सरसोंके तेलको कानमें डाले और वातशूलोक्त औषधियोंका प्रयोग करनेसे कर्णनाद एवं बधिरताका नाश होता है ॥ १३ ॥

एष एव विधिः कार्यः प्रणादे नस्यपूर्वकः । गुडनागरतोयेन नस्यं स्यादुभयोरपि ॥ १४ ॥ कर्णमें अत्यन्त नाद होनेपर प्रथम यथाविधि नस्य देवे, फिर बधिरतानाशक क्रिया करे। दोनोंप्रकारके कर्णनादरोगोंमें गुड और सोंठ इनका क्वाथ बनाकर नस्य देना हितकारी है ॥ १४ ॥

वातोक्तं माषतैलादि बाधिर्यादौ तु योजयेत् । वर्जयेन्मैथुनं क्रोधं रूक्षं बाधिर्यपीडितः ॥ १५ ॥ बधिरतासे पीडित मनुष्य वातव्याधि अधिकारमें कहेहुए माषतैलका प्रयोग करे । इस रोगमें मैथुन और क्रोध करना एवं रूक्ष पदार्थोंका भोजन करना तत्क्षण त्याग देवे ॥ १५ ॥

चूर्णं पञ्चकषायाणां कपित्थरससंयुतम् । कर्णस्रावे प्रशंसन्ति पूरणं मधुना सह ॥ १६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६५

पञ्चवल्कलके चूर्ण और कैथके रसको शहदमें मिलाकर कानमें डालनेसे कानका बहना दूर होता है ॥ १६ ॥

मालतिदलरसमधुना पूरितमथवा गवां मूत्रैः ।
दूरेण परिह्रियेत श्रवणयुगं पूतिरोगेण ॥ १७ ॥
चमेलीके पत्तोंके रसको शहदके साथ मिलाकर अथवा गोमूत्रके साथ मिलाकर कानोंमें डालनेसे कानोंका पूतिरोग बहुत जल्द नष्ट होता है ॥ १७ ॥

हरितालं सगोमूत्रं पूरणं पूतिकर्णजित्।
हरितालको गोमूत्रमें घिसकर कानमें डालनेसे पूतिकर्णरोग दूर होता है ॥

सर्जत्वक्चूर्णसंयुक्तः कार्पासीफलजो रसः ।
मधुना संयुक्तः साधु कर्णस्रावे प्रशस्यते ॥ १८ ॥
कपासके फलोंका रस, शालवृक्षकी छालका चूर्ण और शहद इनको एकत्र मिलाकर कर्णरन्ध्रमें डालनेसे कर्णस्रावरोग शीघ्र आरोग्य होता है ॥ १८ ॥

जम्ब्वाम्रपत्रं तरूणं समांशं कपित्थकार्पासफलं च सार्द्रम् ।
क्षुत्त्वा रसं तं मधुना विमिश्रं स्रावापहं तं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः॥१९॥
जामुन और आमके नवीन कोमल पत्ते कैथ और कपासके गीले फल इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूटकर रस निकाले, फिर उस रसको शहदमें मिलाकर कानमें डाले तो कानका बहना दूर होता है ॥ १९ ॥

पुटपाकविधिस्विन्नो हस्तिविङ्जातछत्रजः ।
रसः सतैलसिन्धूत्थः कर्णस्रावहरः परः ॥ २० ॥
हाथीकी लीदमें उत्पन्नहुए छत्र (साँपकी छतरी) के रसको पुटपाककी विधिसे पकाकर उसमें सरसोंका तेल और सेंधेनमकका चूर्ण मिश्रितकर कानमें भरनेसे कानका स्राव होना निवृत्त होता है ॥ २० ॥

अथ कर्णप्रतीनाहे स्नेहस्वेदौ प्रयोजयेत् ।
ततो विरिक्तशिरसः क्रियां प्राप्तां समाचरेत् ॥ २१ ॥
कर्णप्रतीनाहरोगमें प्रथम स्नेहद्रव्य और स्वेददेवे, पश्चात् नस्य देकर यथादोषा-नुसार चिकित्सा करे ॥ २१ ॥

कर्णपाकस्य भैषज्यं कुर्यात्क्षतविसर्पवत् ।
विधिश्च कफहा सर्वः कर्णकण्डूं व्यपोहति ॥ २२ ॥

११६६ भैषज्यरत्नावली । [ कर्णरोग-

कर्णपाकरोगकी क्षत और विसर्परोगकी समान चिकित्सा करे । एवं कर्णकण्डू- रोगको सर्वप्रकारकी कफनाशक चिकित्सा कर दूर करे ॥ २२ ॥ क्लेदयित्वा तु तैलेन स्वेदेन प्रविलाप्य च । शोधयेत्कर्णगूथं तु भिषक् सम्यक् शलाकया ॥ २३ ॥ कर्णगूथरोगमें कानमें तेल डालकर और स्वेदितकर सूक्ष्म शलाकासे कानके मैलको खींचकर निकालदेवे ॥ २३ ॥ निर्गुण्डीस्वरसस्तैलं सिन्धुधूमरजो गुडः । पूरणात्पूतिकर्णस्य शमनो मधुसंयुक्तः ॥ २४ ॥ सिंहालूके पत्तोंका रस, कडवा तेल, सैंधानमक, घरका धुँआ, पुराना गुड और शहद इनको एकत्र मिलाकर कानमें डालनेसे पूतिकारोग अथवा कर्णपाकरोग शमन होता है ॥ २४ ॥ जातीपत्ररसे तैलं विपक्वं पूतिकर्णजित् । चमेलीके पत्तोंके रसमें कडवे तेलको पकाकर कानमें भरनेसे पूतिकर्णरोग दूर होता है ॥ वरुणार्ककपित्थाम्रजम्बूपल्लवसाधितम् । पूतिकर्णापहं तैलं जातीपत्ररसोऽथवा ॥ २५ ॥ वरना, आक, कैथ, आम और जामुन इनके पत्तोंके द्वारा तेलको पकाकर अथवा केवल चमेलीके पत्तोंके द्वारा तेलको पकाकर कानमें डालनेसे पूतिकर्णरोग आराम होता है ॥ २५ ॥ सूर्यावर्त्तकस्वरसं सिन्दुवाररसं तथा । लाङ्गलीमूलस्वरसं त्र्यूषणेनावचूर्णितम् ॥ पूरयेत्कृमिकर्णं तु जन्तूनां नाशनं परम् ॥ २६ ॥ हुलहुलका रस, सिंहालूके पत्तोंका रस अथवा कलिहारीकी जडका रस इनमेंसे किसी एकके रसमें त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर कानमें डालनेसे कानके कृमि नष्ट होते हैं ॥ २६ ॥ कृमिकर्णकनाशार्थं कृमिघ्नं योजयेद्विधिम् । वार्त्ताकोश्च हितो धूमः सार्षपस्नेह एव च ॥ २७ ॥ कानके कृमियोंको नष्ट करनेके लिये कृमिरोगनाशक चिकित्सा करे । एवं सूखे बैंगनके चूर्णको अग्निमें डालकर उसका धुआँ नलीद्वारा कानमें छोडे या सरसोंका तेलही डाले । इससे कृमिकर्णरोग दूर होता है ॥ २७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता ११६७

हलिसूर्यावर्त्तव्योषस्वरसेनातिपूरिते ।
कर्णे पतन्ति सहसा सर्वांस्तु कृमिजातयः ॥ २८ ॥
कलिहारीके रस और सूर्यावर्त्तके रसमें सोंठ, मिरच, पीपल इनका चूर्ण मिश्रित कर कानमें पूरनेसे सर्वप्रकारके कृमि तत्काल निकल पडते हैं ॥ २८ ॥

घृष्टं रसाञ्जनं नार्याः क्षीरेण क्षौद्रसंयुक्तम् ।
प्रशस्यते चिरोत्थेऽपि सास्रावे पूतिकर्णके ॥ २९ ॥
स्त्रीके दूधमें रसौत घिसकर उसमें शहद मिलाकर कानमें डालनेसे बहुत पुराना और स्रावयुक्त पूतिकर्णरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९ ॥

दीपिकातैल ।

महतः पञ्चमूलस्य काण्डान्यष्टाङ्गुलानि च ।
क्षौमेणावेष्ट्य संसिच्य तैलेनादीपयेत्ततः ॥ ३० ॥
यत्तैलं च्यवते तेभ्यः सुखोष्णं तत्प्रयोजयेत् ।
ज्ञेयं तद्दीपिकातैलं सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ॥ ३१ ॥
एवं कुर्याद्भद्रकाष्ठे कुष्ठे काष्ठे च सारले ।
मतिमान् दीपिकातैलं कर्णशूलनिवारणम् ॥ ३२ ॥
बेल, सोनापाठा, कुम्भेरे, पाढल और अरणी इनमेंसे किसी एक वृक्षकी आठ अँगुल लम्बी लकडी लेकर उसको रेशमीवस्त्रसे लपेटकर और तेलमें भिगोकर बत्तीके समान जलावे । उसमेंसे जो बूँदें टपकें उनको सुहाता सुहाता कानमें डाले । इस प्रकार करनेसे यह दीपिकातेल कानकी पीडाको तत्काल नष्ट करता है । इसी प्रकार देवदारु, कूठ और सरलकाठका दीपिकातेल बनाकर कानमें डालनेसे भी कर्णशूल नष्ट होता है ॥ ३०–३२ ॥

स्वर्जिकाद्यतैल ।

स्वर्जिकामूलकं शुष्कं हिंगु कृष्णा महौषधम् ।
शतपुष्पा च तैस्तैलं पक्वं शुक्तं चतुर्गुणम् ॥
प्रणादशूलबाधिर्यं स्रावं चाशु व्यपोहति ॥ ३३ ॥
सज्जी, सूखीमुली, हींग, पीपल, सोंठ और सोया इनके समान भाग मिश्रित एकसेर कल्क और चौगुनी काँजीके द्वारा दो सेर तिलके तेलको विधिपूर्वक पकावे । यह तेल कानमें डालनेसे कर्णनाद, कर्णशूल, कर्णस्राव और बाधिर्य दूर होते हैं ॥ ३३ ॥

११६८ भेषज्यरत्नावली । [ कर्णरोग-


लशुनाद्य तैल ।

लशुनामलकं तालं पिष्ट्वा तैले चतुर्गुणे ।
तैलाच्चतुर्गुणं क्षीरं पाच्यं तैलावशेषकम् ॥
तत्तैलं पूरयेत्कर्णे बाधिर्यं परिणाशयेत् ॥ ३४ ॥

लहसुन, आमले और हरिताल इनको समान भाग मिश्रित एक सेर लेवे, सबको एकत्र पीसकर कल्क बनावे फिर उस कल्क एवं एक सेर तिलके तेल और तेलसे चौगुने बकरीके दूधको चौगुने जलमें डालकर उत्तम प्रकार पकावे जब पकते २ तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारलेवे । उस तेलको कानमें डालनेसे बहरापन दूर होजाता है ॥ ३४ ॥

शम्बूकतैल ।

शम्बूकस्य च मांसेन कटुतैलं विपाचितम् ।
तस्य पूरणमात्रेण कर्णनाडी प्रशाम्यति ॥ ३५ ॥

शम्बूक (घोंघे) के मांसद्वारा सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकाकर कानमें डालनेसे कर्णनाडीरोग नष्ट होता है ॥ ३५ ॥

कुष्ठाद्यतैल ।

कुष्ठहिंगुवचादारुशताह्वाविश्वसैन्धवैः ।
पूतिकर्णापहं तैलं बस्तमूत्रेण साधितम् ॥ ३६ ॥

कूठ, हींग, वच, देवदारु, सोया, सोंठ और सेंधानमक इनके कल्क और बकरीके मूत्रके सहयोगसे सिद्ध कियाहुआ तेल पूतिकर्ण रोगको हरता है ॥ ३६ ॥

क्षारतैल ।

बालमूलकशुण्ठीनां क्षारो हिंगु सनागरम् ।
शतपुष्पा वचा कुष्ठदारुशिग्रुरसाञ्जनम् ॥ ३७ ॥
सौवर्चलयवक्षारस्वर्जिकोद्भिदसैन्धवम् ।
भूर्जग्रन्थिविडं मुस्तं मधुशुक्तं चतुर्गुणम् ॥ ३८ ॥
मातुलुङ्गरसश्चैव कदल्या रस एव च ।
तैलमेभिर्विपक्तव्यं कर्णशूलहरं परम् ॥ ३९ ॥
बाधिर्यं कर्णनादञ्च पूयस्रावश्च दारुणः ।
पूरणादस्य तैलस्य कृमयः कर्णसंश्रिताः ॥ ४० ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९९

क्षिप्रं विनाशं गच्छन्ति कृष्णात्रेयस्य शासनात् । क्षारतैलमिदं श्रेष्ठं मुखदन्तामयापहम् ॥ ४१ ॥

कच्चीमूलीको सुखाकर उसका क्षार निकाले । फिर वह क्षार, हींग, सोंठ, सौंयां, बच, कूट, देवदारु, सहिंजनेकी छाल, रसौत, काला नमक, जवाखार, सज्जी, रेह-गमा ( ? ) या समुद्र नमक, सेंधानमक, भोजपत्र, पीपलामूल, विरियासञ्चरनमक और नागरमोथा इन सब औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित एक सेर और मधुशुक्तनामक काँजी कल्कसे चौगुनी लेवे । इनके साथ बिजौरेंनींबूके रस, केलेकें रस और तिलके तेलको दो दो सेर परिमाण मिलाकर विधिपूर्वक तेलको सिद्धकरे । प्रतिदिन नियमसे इस तेलको कानमें डालनेसे यह क्षारतेल कर्णशूल, बधिरता, कर्ण-नाद एवं दारुण पूयस्रावको तत्काल नष्ट करता है । इससे कानके कृमि शीघ्र पतित होजाते हैं ऐसा कृष्णात्रेय महाराजने कहा है यह तेल मुख और दाँतोंके रोगोंको नष्ट करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३७-४१ ॥

कर्णरोगमें पथ्य ।

स्वेदो विरेको वमनं नस्यं धूमः शिराव्यधः । गोधूमाः शालयो मुद्गा यवाश्च प्रतनं हविः ॥ ४२ ॥ लावो मयूरो हरिणस्तिन्तिरिर्वन्यकुक्कुटः । पटोलं शिग्रु वार्त्ताकुः सुनिषण्णं कठिल्लकम् ॥ ४३ ॥ रसायनानि सर्वाणि ब्रह्मचर्यमभाषणम् । उपयुक्तं यथादोषमिदं कर्णामयं हरेत् ॥ ४४ ॥

स्वेद, विरेचन, वमन, नस्य, धूम, और शिरावेध करना, गेहूँ, शालिचावल, मूँग, जौ पुराना घी, लवा, मोर, हिरण, तीतर और जंगली मुर्गा इनका मांस, पटोलपात,


^१-मधुशुक्तलक्षण-मधुप्रधानं शुक्तं तु मधुशुक्तं तथाऽपरम्।
जम्बीरस्य फलरसं पिप्पलीग्रन्थिसंयुतम् ॥
मधुभाण्डे विनिक्षिप्य धान्यराशौ निधापयेत् ।
मासेन तज्जातरसं मधुशुक्तमुदाहृतम् ॥

जम्बीरीनींबूका स्वरस १ प्रस्थ, पीपरामूल १६ तोले और शहद ३२ तोले इन सबको एकत्र मिलाकर मिट्टीके घीसे चिकने बासनमें भरकर धानोकी राशि ( ढेर ) में गाडदेवे । फिर एक महीनेके बाद उसको निकाले । इस प्रकार बनायेहुए पदार्थमेंसे जो रस निकलता है उसको मधुशुक्त कहते हैं ॥

७५ (

११७०भैषज्यरत्नावली ।[ नासारोग-

सहिंजना, बैंगन, शिरिआरीका शाक, करेला, सब प्रकारकी रसायनक्रिया, ब्रह्मचर्य धारण और अल्पभाषण ये सब यथादोषानुसार उपचार करनेसे कर्णरोगको दूर करते हैं ॥ ४२-४४ ॥

कर्णरोगमें अपथ्य ।

विरुद्धान्यन्नपानानि वेगरोधं प्रजल्पनम् ।
दन्तकाष्ठं शिरःस्नानं व्यायामं श्लेष्मलं गुरु ॥
कण्डूयनं तुषारं च कर्णरोगी परित्यजेत् ॥ ४५ ॥

विरुद्ध अन्नपान, मल मूत्रके वेगको रोकना, अधिक बोलना दातौन, सिरसे स्नान और व्यायाम करना, कफकारक तथा गुरुपाकी द्रव्योंका सेवन, कानको खुजलाना और शीतका सेवन करना इन सबको कर्णरोगी त्यागदेवे ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां कर्णरोगचिकित्सा ।


नासारोगकी चिकित्सा ।

सर्वेषु पीनसेष्वादौनिर्वातागारगो भवेत् ।
स्नेहनस्वेदवमनं धूमगण्डूषधारणम् ॥ १ ॥

सर्वप्रकारके पीनसरोगमें प्रथम रोगीको वातरहित स्थानमें रक्खे, पश्चात् स्नेह स्वेद, धूम, वमन कराकर गण्डूषधारण करावे ॥ १ ॥

वासो गुरूष्णं शिरसः सुघनं परिवेष्टनम् ।
लघूष्णं लवणं स्निग्धमुष्णभोजनमद्रवम् ॥ २ ॥

पीनसरोगमें भारी, गरम और घने वस्त्रसे शिरको अच्छे प्रकार बाँध लेवे और भोजनके लिये हल्के, गरम, नमकीन, स्निग्ध और जो पतले न हों ऐसे पदार्थ सुहाते सुहाते भोजन करे ॥ २ ॥

पञ्चमूलीशृतं क्षीरं स्याच्चित्रकहरीतकी ।
सर्पिर्गुडः षडङ्गश्च यूषः पीनसशान्तये ॥ ३ ॥

पीनसरोगको शान्त करनेके लिये पञ्चमूलकी औषधियोंद्वारा सिद्ध किया हुआ दूध, चीता, हरड, घी, गुड, षडङ्ग यूष इनमेंसे किसी एकको सेवन करावे ॥

नासापाके पित्तहरं विधानं कार्यं सर्वं बाह्यमाभ्यन्तरं च ।
हृत्वा रक्तं क्षीरिवृक्षत्वचश्च योज्याः सेके सर्पिषश्च प्रदेहाः ॥ ४ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७१

नासारोगके पकजानेपर रक्तमोक्षण कराकर बाहर तथा भीतर सर्व प्रकारकीं पित्तनाशक चिकित्सा करे। एवं क्षीरीवृक्षोंकी छालको पीसकर घृत मिलाकर लेप करे और उक्त छालका क्वाथ बनाकर उससे सेंके ॥ ४ ॥
पूयास्रे रक्तपित्तघ्नाः कषाया नावनानि च ॥
नाकमेंसे पीब निकले तो रक्तपित्तनाशक क्वाथ और नस्य प्रयोग करे ॥
दीप्ते रोगे पैत्तिके संविधानं कार्यं कुर्यान्मधुरं शीतलं च ।
नासादाहे स्नेहपानं प्रधानं स्निग्धा धूमा ऊर्ध्ववस्तिश्च नित्यम् ॥
पित्तज दीप्तरोगमें पित्तनाशक मधुर और शीतल क्रिया करे । एवं नासादाहमें स्नेहपान, स्निग्धधूम और ऊर्ध्ववस्ति प्रतिदिन प्रयोग करे ॥ ५ ॥
वातिके तु प्रतिश्याये पिबेत्सर्पिर्यथाक्रमम् ।
पञ्चभिर्लवणैः सिद्धं प्रथमेन गणेन च
नस्यादिषु विधिं कृत्स्नमवेक्षेतार्दितेरितम् ॥ ६ ॥
वातज प्रतिश्यायमें पञ्चलवणद्वारा सिद्ध किया हुआ अथवा विदारीगन्धादिग-णोक्त औषधियोंके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध किया हुआ घृत पान करे और अर्दितरोगमें कहीहुई औषधियोंके द्वारा नस्य प्रदान करे ॥ ६ ॥
पित्तरक्तोत्थयोः पेयं सर्पिर्मधुरकैः शृतम् ।
परिषेकान्प्रदेहांश्च कुर्यादपि च शीतलान् ॥ ७ ॥
पित्तज और रक्तज प्रतिश्यायमें काकोल्यादिगणोक्त औषधोंके द्वारा घृतकों सिद्ध कर पान करे और शीतल द्रव्योंसे परिषेक तथा प्रलेप करे ॥
कफजे सर्पिषा स्निग्धं तिलमाषविपक्वया ।
यवाग्वा वामयित्वा वा कफघ्नं क्रममाचरेत् ॥ ८ ॥
कफजनित प्रतिश्यायमें रोगीको घृत पान कराकर स्निग्ध करे, तिल और उड-दौँके द्वारा यवागूको सिद्ध कर उसमें मैनफलका चूर्ण डालकर पान करावे । इससे जब रोगीको अच्छे प्रकार वमन होजाय तब कफनाशक चिकित्सा करे ॥ ८ ॥
दार्वीडुद्दीनकुम्भैश्च किणिह्या सुरसेन च ।
वर्त्तयोऽत्र कृता योज्या धूमपाने यथाविधि ॥ ९ ॥
दारुहल्दी, डिङ्गोद, दन्तीके बीज, चिगचिटा, सिह्लालु इन सबको एकत्र कूटपीस कर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीका प्रतिश्यायमें यथाविधि धूमपान करे ॥

११७२ | भैषज्यरत्नावली । | [ नासारोग- ]


अथवा सघृतान्सक्तून् कृत्वा मल्लिकसम्पुटे । नवप्रतिश्यायवतां धूमं वैद्यः प्रयोजयेत् ॥ १० ॥ नवीन प्रतिश्यायरोगमें प्रथम घीमें मिलेहुए जौके सत्तूओंको एक सकोरेमें भर-कर अग्निपर रक्खे और उसके ऊपर एक छेदवाला दूसरा सकोरा ढकदेवे । फिर उसमेंसे जो धुआँ निकले उसको चमेलीके पत्तोंकी निर्मित नलीके द्वारा रोगीके नासारन्ध्रमें प्रवेश कराना हितकर है ॥ १० ॥

यः पिबति शयनकाले शयनारूढः सुशीतलं भूरि । सलिलं पीनसयुक्तः समुच्यते तेन रोगेण ॥ ११ ॥ जो पुरुष शयन करते समय शय्यापर बैठा बहुतसा शीतल जल पीवे तो वह पीनसरोगसे मुक्त होजाता है ॥ ११ ॥

पुटपक्वं जयापत्रं सिन्धुतैलसमायुतम् । प्रतिश्यायेषु सर्वेषु शीलितं परमौषधम् ॥ १२ ॥ जयन्तीके पत्तोंको पुटपाककी रीतिसे पकाकर रस निकालले, उसमें सैंधानमक और कडवातैल मिलाकर सर्वप्रकारके प्रतिश्यायोंमें पान करावे ॥ १२ ॥

सोष्णं गुडसंयुक्तं स्निग्धदध्यम्लभोजनम् । नवप्रतिश्यायहरं विशेषात्कफपाचनम् ॥ १३ ॥ गुडमिश्रित कालीमिरचोंका चूर्ण, स्निग्धपदार्थ, दही और खट्टे पदार्थोंका भोजन करनेसे नूतन प्रतिश्याय दूर होता है और विशेषकर कफ पकता है ॥

प्रतिश्याये नवे शस्तो यूषश्चिञ्चाच्छदोद्भवः । ततः पक्वं कफं ज्ञात्वा हरेच्छीर्षविरेचनैः ॥ १४ ॥ नये प्रतिश्याय (जुकाम) में इमलीके पत्तोंका यूष पान करना श्रेष्ठ है । जो कफ पकगया हो तो उसको शिरोविरेचन अर्थात् नस्य देकर दूर करे ॥ १४ ॥

शिरसोऽभ्यञ्जनस्वेदनस्यकद्वम्लभोजनैः । वमनैर्घृतपानैश्च तान् यथास्वमुपाचरेत् ॥ १५ ॥ इस रोगमें शिरमें मालिश, स्वेद, नस्य तथा चरपरे और खट्टे पदार्थोंका भोजन, एवं वमन और घृतपान इत्यादि क्रियाओंका यथेच्छ उपचार करे ॥ १५ ॥

भक्षयति भुक्तमात्रे सलवणसुस्विन्नमाषमत्युष्णम् । स जयति सर्वसमुत्थं चिरजातं च प्रतिश्यायम् ॥ १६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११०५


भोजन करनेके अनन्तर सेंधैनमकके साथ उसीजेहुए उड़द सुहाते सुहाते भक्षण करे । इससे बहुत पुराना सर्वप्रकारका प्रतिश्याय नष्ट होता है ॥ १६ ॥

पिप्पल्यः शिग्रुबीजानि विडङ्गं मरिचानि च ।
अवपीडः प्रशस्तोऽयं प्रतिश्यायनिवारणः ॥ १७ ॥

पीपल, सहिंजनेके बीज, वायविडङ्ग और कालीमिरच इनके चूर्णको समान भाग लेकर उसका नस्य ग्रहण करे तो प्रतिश्याय दूर होता है ॥ १७ ॥

कलिङ्गहिङ्गुमरिचलाक्षासुरसकट्फलैः ।
व्योषोग्राशिग्रुजन्तुघ्नैरवपीडः प्रशस्यते ॥ १८ ॥

इन्द्रजौ, हींग, मिरच, लाख, तुलसी, कायफल, त्रिकुटा, वच, सहिंजनेके बीज, वायविडङ्ग इनका चूर्ण एकत्र मिश्रितकर नास देवेतो नासारोग जाय ॥

तैरेव मूत्रसंयुक्तैः कटुतैलं विपाचयेत् ।
प्रपीनसे पूतिनस्ये शमनं परिकीर्तितम् ॥ १९ ॥

उक्त औषधियोंके चूर्णको गोमूत्रमें डालकर उसके द्वारा कडवे तेलकों विधिपूर्वक पकावे । उस तेलको नस्य देनेसे पीनसरोग शमन होता है ॥ १९ ॥

समूत्रपिष्टाश्चोद्दिष्टाः क्रियाः कृमिषु योजयेत् ।
नावनार्थं कृमिघ्नानि भेषजानि च बुद्धिमान् ॥
शेषाणां तु विकाराणां यथास्वं स्याच्चिकित्सितम् ॥ २० ॥

नाकमें कीडे पड़गये होंतो कृमिनाशक औषधियोंको गोमूत्रमें पीसकर नस्य देवे अथवा सुरसादिगणोक्त औषधोंके क्वाथद्वारा नस्य देवे तो नाकके कृमि तत्काल नष्ट होजाते हैं । नासार्बुद और नाशार्श आदि अन्यान्य सर्वप्रकारके नासिकाकें विकारोंमें यथाक्रम अर्बुद और अर्शरोगके समान चिकित्सा करे ॥

चित्रक-हरीतकी ।

चित्रकस्यामलक्याश्च गुडूच्या दशमूलजम् ।
शतं शतं रसं दत्त्वा पथ्याचूर्णाढकं गुडात् ॥ २१ ॥
शतं पचेद्धनीभूते पलद्वादशकं क्षिपेत् ।
व्योषत्रिजातयोः क्षारात्पलाईमपरेऽहनि ॥ २२ ॥
प्रस्थार्द्धं मधुनो दत्त्वा यथायग्न्यद्यादतन्द्रितः ।
वृद्धयेऽग्नेः क्षयं कासं पीनसं दुस्तरं कृमीन् ॥
गुल्मोदावर्त्तदुर्णामश्वासान्हन्ति सुदारुणान् ॥ २३ ॥

११७४ भैषज्यरत्नावली । [ नासारोग-

लालचीतेकी जडका रस, आंमलोंका रस, गिलोयका रस और दशमूलका क्वाथ इन सबोंको पृथक् पृथक् सौ सौ पल लेकर एकत्र मिलादेवे। फिर उसमें हरडका चूर्ण एक आढक और गुड सौ पल डालकर विधिपूर्वक पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, दारचीनी, इलायची और तेज-पात इन समस्त औषधियोंके १२ पल चूर्ण और दो तोले जवाखारको डालकर सबको चलाकर एकमएक करलेवे। फिर दूसरे दिन उसमें एक प्रस्थ उत्तम शहद मिलाकर स्वच्छ पात्रमें करके रखदेवे। उसमेंसे प्रतिदिन अपनी अग्निके बलाबलको विचारकर उचित मात्रासे सेवन करे तो जठराग्नि अत्यन्त प्रदीप्त होती है। यह चित्रकहरीतकी क्षय, खाँसी, पीनस, दुस्तर कृमिरोग, गुल्म, उदावर्त्त, बवासीर, दारुण श्वासप्रभृतिरोगोंको नष्ट करती है ॥ २१-२३ ॥

पाठाद्यतैल ।

पाठाद्विरजनीमूर्वापिप्पलीजातिपल्लवैः ।
दन्त्या च तैलं संसिद्धं नस्यं संपक्वपीनसम् ॥ २४ ॥
पाठ, हल्दी, दारुहल्दी, मूर्वा, पीपल, चमेलीके पत्ते और दन्तीकी जड इनके कल्कद्वारा सरसोंके तेलको यथाविधि पकाकर पक्व पीनसरोगमें नस्यद्वारा प्रयोग करे ॥ २४ ॥

व्याघ्राद्यतैल ।

व्याघ्रीदन्तीवचाशिग्रुसुरसाव्योषसैन्धवैः ।
पाचितं नावनं तैलं पूतिनासागदापहम् ॥ २५ ॥
कटेरी, दन्ती, वच, सहिंजना, सिह्नालु, त्रिकुटा और सैंधानमक इनके कल्क-द्वारा पकायाहुआ तेल नस्यद्वारा ग्रहण करनेसे पूतिनासारोगको हरता है ॥

त्रिकट्वाद्यतैल ।

त्रिकटुकविडङ्गसैन्धवबृहतीफलशिग्रुसुरसदन्तीभिः ।
तैलं गोजलसिद्धं नस्यं स्यात्पूतिनस्यस्य ॥ २६ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल, रायविडङ्ग, सैंधानमक, बडीकटेरीके फल, सहिंजनेके बीज सिह्नालु और दन्तीके बीज इनके कल्क और गोमूत्रके साथ सरसोंके तेलको सिद्ध कर नास देवे तो इससे पूतिनस्यरोगका नाश होता है ॥ २६ ॥

चित्रकतैल ।

चित्रकचविकादीप्यकनिदिग्धिकाकरञ्जबीजलवणार्कैः ।
गोमूत्रयुतैः सिद्धं तैलं नासार्शासां शान्त्यै ॥ २७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७५

चीता, चव्य, अजवायन, कटेरी, करञ्जके बीज सैंधानमक और आकका दूध इन औषधियोंके कल्क एवं गोमूत्रके द्वारा कडवे तैलको यथारीति सिद्ध करे । फिर उस तेलको नासार्शरोगकी शान्तिके लिये नस्यद्वारा व्यवहार करे ॥

नासारोगमें पथ्य ।

स्थितिर्निर्वातनिलये प्रगाढोष्णीषधारणम् ।
गण्डूषो लंघनं नस्यं धूमश्चर्द्धिः शिराव्यधः ॥ २८ ॥
कटुचूर्णं नासारन्ध्रे निक्षिप्यान्तः प्रवेशनम् ।
स्वेदः स्नेहःशिरोऽभ्यङ्गः पुराणा यवशालयः ॥ २९ ॥
कुलत्थमुद्गयोर्यूषो ग्राम्यजाङ्गलजा रसाः ।
वार्त्ताकुः कुलकं शिग्रुः कर्कोटं बालमूलकम् ॥ ३० ॥
लशुनं दधि तप्ताम्बु वारुणी च कटुत्रयम् ।
कट्वम्ललवणं स्निग्धमुष्णं लघु च भोजनम् ॥
नासारोगे पीनसौ सेव्यमेतद्यथामलम् ॥ ३१ ॥

वायुरहित स्थानमें रहना, शिरमें पगडी या मोटा कपडा बाँधना, गण्डूष, लंघन, नस्य, धूमपान वमन और शिरावेध करना, कटुद्रव्योंका चूर्ण नासिकाके छिद्रोंमें डालकर छींकें लेना, स्वेद देना, स्नेहप्रयोग, शिरमें मालिश करना, पुराने जौ, शालिचावल, कुलथीका और मूँगका यूष, ग्रामीण और जङ्गली जीवोंका मांसरस, बैंगन, परवल, सहिंजना, ककोडे, कच्ची मूली, लहसुन, दही, गरम जल, मद्य, त्रिकुटा, चरपरे, खट्टे, नमकीन, स्निग्ध, गरम और हल्का भोजन ये सब वस्तुएँ यथादोषानुसार सेवन करनेसे पीनस और नासारोगमें हित करनेवाली हैं ॥२८-३१॥

नासारोगमें अपथ्य ।

विरुद्धानि दिवास्वप्नमभिष्यन्दि गुरूणि च ।
स्नानं क्रोधं शकृन्मूत्रबाष्पवेगाञ्छुचं द्रवम् ॥
भूशय्यामपि यत्नेन नासारोगी परित्यजेत ॥ ३२ ॥

विरुद्ध द्रव्योंका भोजन, दिनमें सोना, कफकारक और गुरुपाकी द्रव्य, स्नान, क्रोध करना, मल, मूत्र, और आँसुओंके वेगको रोकना, शोक करना, पतले पदार्थोंका सेवन और पृथ्वीमें सोना इन सबको नासारोगी यत्नपूर्वक त्याग देवे ॥ ३२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् नासारोगचिकित्सा ॥