भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६८ भेषज्यरत्नावली । [ कर्णरोग-
लशुनाद्य तैल ।
लशुनामलकं तालं पिष्ट्वा तैले चतुर्गुणे ।
तैलाच्चतुर्गुणं क्षीरं पाच्यं तैलावशेषकम् ॥
तत्तैलं पूरयेत्कर्णे बाधिर्यं परिणाशयेत् ॥ ३४ ॥
लहसुन, आमले और हरिताल इनको समान भाग मिश्रित एक सेर लेवे, सबको एकत्र पीसकर कल्क बनावे फिर उस कल्क एवं एक सेर तिलके तेल और तेलसे चौगुने बकरीके दूधको चौगुने जलमें डालकर उत्तम प्रकार पकावे जब पकते २ तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारलेवे । उस तेलको कानमें डालनेसे बहरापन दूर होजाता है ॥ ३४ ॥
शम्बूकतैल ।
शम्बूकस्य च मांसेन कटुतैलं विपाचितम् ।
तस्य पूरणमात्रेण कर्णनाडी प्रशाम्यति ॥ ३५ ॥
शम्बूक (घोंघे) के मांसद्वारा सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकाकर कानमें डालनेसे कर्णनाडीरोग नष्ट होता है ॥ ३५ ॥
कुष्ठाद्यतैल ।
कुष्ठहिंगुवचादारुशताह्वाविश्वसैन्धवैः ।
पूतिकर्णापहं तैलं बस्तमूत्रेण साधितम् ॥ ३६ ॥
कूठ, हींग, वच, देवदारु, सोया, सोंठ और सेंधानमक इनके कल्क और बकरीके मूत्रके सहयोगसे सिद्ध कियाहुआ तेल पूतिकर्ण रोगको हरता है ॥ ३६ ॥
क्षारतैल ।
बालमूलकशुण्ठीनां क्षारो हिंगु सनागरम् ।
शतपुष्पा वचा कुष्ठदारुशिग्रुरसाञ्जनम् ॥ ३७ ॥
सौवर्चलयवक्षारस्वर्जिकोद्भिदसैन्धवम् ।
भूर्जग्रन्थिविडं मुस्तं मधुशुक्तं चतुर्गुणम् ॥ ३८ ॥
मातुलुङ्गरसश्चैव कदल्या रस एव च ।
तैलमेभिर्विपक्तव्यं कर्णशूलहरं परम् ॥ ३९ ॥
बाधिर्यं कर्णनादञ्च पूयस्रावश्च दारुणः ।
पूरणादस्य तैलस्य कृमयः कर्णसंश्रिताः ॥ ४० ॥