भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९९
क्षिप्रं विनाशं गच्छन्ति कृष्णात्रेयस्य शासनात् । क्षारतैलमिदं श्रेष्ठं मुखदन्तामयापहम् ॥ ४१ ॥
कच्चीमूलीको सुखाकर उसका क्षार निकाले । फिर वह क्षार, हींग, सोंठ, सौंयां, बच, कूट, देवदारु, सहिंजनेकी छाल, रसौत, काला नमक, जवाखार, सज्जी, रेह-गमा ( ? ) या समुद्र नमक, सेंधानमक, भोजपत्र, पीपलामूल, विरियासञ्चरनमक और नागरमोथा इन सब औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित एक सेर और मधुशुक्तनामक काँजी कल्कसे चौगुनी लेवे । इनके साथ बिजौरेंनींबूके रस, केलेकें रस और तिलके तेलको दो दो सेर परिमाण मिलाकर विधिपूर्वक तेलको सिद्धकरे । प्रतिदिन नियमसे इस तेलको कानमें डालनेसे यह क्षारतेल कर्णशूल, बधिरता, कर्ण-नाद एवं दारुण पूयस्रावको तत्काल नष्ट करता है । इससे कानके कृमि शीघ्र पतित होजाते हैं ऐसा कृष्णात्रेय महाराजने कहा है यह तेल मुख और दाँतोंके रोगोंको नष्ट करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३७-४१ ॥
कर्णरोगमें पथ्य ।
स्वेदो विरेको वमनं नस्यं धूमः शिराव्यधः । गोधूमाः शालयो मुद्गा यवाश्च प्रतनं हविः ॥ ४२ ॥ लावो मयूरो हरिणस्तिन्तिरिर्वन्यकुक्कुटः । पटोलं शिग्रु वार्त्ताकुः सुनिषण्णं कठिल्लकम् ॥ ४३ ॥ रसायनानि सर्वाणि ब्रह्मचर्यमभाषणम् । उपयुक्तं यथादोषमिदं कर्णामयं हरेत् ॥ ४४ ॥
स्वेद, विरेचन, वमन, नस्य, धूम, और शिरावेध करना, गेहूँ, शालिचावल, मूँग, जौ पुराना घी, लवा, मोर, हिरण, तीतर और जंगली मुर्गा इनका मांस, पटोलपात,
^१-मधुशुक्तलक्षण-मधुप्रधानं शुक्तं तु मधुशुक्तं तथाऽपरम्।
जम्बीरस्य फलरसं पिप्पलीग्रन्थिसंयुतम् ॥
मधुभाण्डे विनिक्षिप्य धान्यराशौ निधापयेत् ।
मासेन तज्जातरसं मधुशुक्तमुदाहृतम् ॥
जम्बीरीनींबूका स्वरस १ प्रस्थ, पीपरामूल १६ तोले और शहद ३२ तोले इन सबको एकत्र मिलाकर मिट्टीके घीसे चिकने बासनमें भरकर धानोकी राशि ( ढेर ) में गाडदेवे । फिर एक महीनेके बाद उसको निकाले । इस प्रकार बनायेहुए पदार्थमेंसे जो रस निकलता है उसको मधुशुक्त कहते हैं ॥
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