भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११७० | भैषज्यरत्नावली । | [ नासारोग- |
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सहिंजना, बैंगन, शिरिआरीका शाक, करेला, सब प्रकारकी रसायनक्रिया, ब्रह्मचर्य धारण और अल्पभाषण ये सब यथादोषानुसार उपचार करनेसे कर्णरोगको दूर करते हैं ॥ ४२-४४ ॥
कर्णरोगमें अपथ्य ।
विरुद्धान्यन्नपानानि वेगरोधं प्रजल्पनम् ।
दन्तकाष्ठं शिरःस्नानं व्यायामं श्लेष्मलं गुरु ॥
कण्डूयनं तुषारं च कर्णरोगी परित्यजेत् ॥ ४५ ॥
विरुद्ध अन्नपान, मल मूत्रके वेगको रोकना, अधिक बोलना दातौन, सिरसे स्नान और व्यायाम करना, कफकारक तथा गुरुपाकी द्रव्योंका सेवन, कानको खुजलाना और शीतका सेवन करना इन सबको कर्णरोगी त्यागदेवे ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां कर्णरोगचिकित्सा ।
नासारोगकी चिकित्सा ।
सर्वेषु पीनसेष्वादौनिर्वातागारगो भवेत् ।
स्नेहनस्वेदवमनं धूमगण्डूषधारणम् ॥ १ ॥
सर्वप्रकारके पीनसरोगमें प्रथम रोगीको वातरहित स्थानमें रक्खे, पश्चात् स्नेह स्वेद, धूम, वमन कराकर गण्डूषधारण करावे ॥ १ ॥
वासो गुरूष्णं शिरसः सुघनं परिवेष्टनम् ।
लघूष्णं लवणं स्निग्धमुष्णभोजनमद्रवम् ॥ २ ॥
पीनसरोगमें भारी, गरम और घने वस्त्रसे शिरको अच्छे प्रकार बाँध लेवे और भोजनके लिये हल्के, गरम, नमकीन, स्निग्ध और जो पतले न हों ऐसे पदार्थ सुहाते सुहाते भोजन करे ॥ २ ॥
पञ्चमूलीशृतं क्षीरं स्याच्चित्रकहरीतकी ।
सर्पिर्गुडः षडङ्गश्च यूषः पीनसशान्तये ॥ ३ ॥
पीनसरोगको शान्त करनेके लिये पञ्चमूलकी औषधियोंद्वारा सिद्ध किया हुआ दूध, चीता, हरड, घी, गुड, षडङ्ग यूष इनमेंसे किसी एकको सेवन करावे ॥
नासापाके पित्तहरं विधानं कार्यं सर्वं बाह्यमाभ्यन्तरं च ।
हृत्वा रक्तं क्षीरिवृक्षत्वचश्च योज्याः सेके सर्पिषश्च प्रदेहाः ॥ ४ ॥