भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७१
नासारोगके पकजानेपर रक्तमोक्षण कराकर बाहर तथा भीतर सर्व प्रकारकीं पित्तनाशक चिकित्सा करे। एवं क्षीरीवृक्षोंकी छालको पीसकर घृत मिलाकर लेप करे और उक्त छालका क्वाथ बनाकर उससे सेंके ॥ ४ ॥
पूयास्रे रक्तपित्तघ्नाः कषाया नावनानि च ॥
नाकमेंसे पीब निकले तो रक्तपित्तनाशक क्वाथ और नस्य प्रयोग करे ॥
दीप्ते रोगे पैत्तिके संविधानं कार्यं कुर्यान्मधुरं शीतलं च ।
नासादाहे स्नेहपानं प्रधानं स्निग्धा धूमा ऊर्ध्ववस्तिश्च नित्यम् ॥
पित्तज दीप्तरोगमें पित्तनाशक मधुर और शीतल क्रिया करे । एवं नासादाहमें स्नेहपान, स्निग्धधूम और ऊर्ध्ववस्ति प्रतिदिन प्रयोग करे ॥ ५ ॥
वातिके तु प्रतिश्याये पिबेत्सर्पिर्यथाक्रमम् ।
पञ्चभिर्लवणैः सिद्धं प्रथमेन गणेन च
नस्यादिषु विधिं कृत्स्नमवेक्षेतार्दितेरितम् ॥ ६ ॥
वातज प्रतिश्यायमें पञ्चलवणद्वारा सिद्ध किया हुआ अथवा विदारीगन्धादिग-णोक्त औषधियोंके क्वाथ और कल्कद्वारा सिद्ध किया हुआ घृत पान करे और अर्दितरोगमें कहीहुई औषधियोंके द्वारा नस्य प्रदान करे ॥ ६ ॥
पित्तरक्तोत्थयोः पेयं सर्पिर्मधुरकैः शृतम् ।
परिषेकान्प्रदेहांश्च कुर्यादपि च शीतलान् ॥ ७ ॥
पित्तज और रक्तज प्रतिश्यायमें काकोल्यादिगणोक्त औषधोंके द्वारा घृतकों सिद्ध कर पान करे और शीतल द्रव्योंसे परिषेक तथा प्रलेप करे ॥
कफजे सर्पिषा स्निग्धं तिलमाषविपक्वया ।
यवाग्वा वामयित्वा वा कफघ्नं क्रममाचरेत् ॥ ८ ॥
कफजनित प्रतिश्यायमें रोगीको घृत पान कराकर स्निग्ध करे, तिल और उड-दौँके द्वारा यवागूको सिद्ध कर उसमें मैनफलका चूर्ण डालकर पान करावे । इससे जब रोगीको अच्छे प्रकार वमन होजाय तब कफनाशक चिकित्सा करे ॥ ८ ॥
दार्वीडुद्दीनकुम्भैश्च किणिह्या सुरसेन च ।
वर्त्तयोऽत्र कृता योज्या धूमपाने यथाविधि ॥ ९ ॥
दारुहल्दी, डिङ्गोद, दन्तीके बीज, चिगचिटा, सिह्लालु इन सबको एकत्र कूटपीस कर बत्ती बनालेवे । इस बत्तीका प्रतिश्यायमें यथाविधि धूमपान करे ॥