भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११७२ | भैषज्यरत्नावली । | [ नासारोग- ]
अथवा सघृतान्सक्तून् कृत्वा मल्लिकसम्पुटे । नवप्रतिश्यायवतां धूमं वैद्यः प्रयोजयेत् ॥ १० ॥ नवीन प्रतिश्यायरोगमें प्रथम घीमें मिलेहुए जौके सत्तूओंको एक सकोरेमें भर-कर अग्निपर रक्खे और उसके ऊपर एक छेदवाला दूसरा सकोरा ढकदेवे । फिर उसमेंसे जो धुआँ निकले उसको चमेलीके पत्तोंकी निर्मित नलीके द्वारा रोगीके नासारन्ध्रमें प्रवेश कराना हितकर है ॥ १० ॥
यः पिबति शयनकाले शयनारूढः सुशीतलं भूरि । सलिलं पीनसयुक्तः समुच्यते तेन रोगेण ॥ ११ ॥ जो पुरुष शयन करते समय शय्यापर बैठा बहुतसा शीतल जल पीवे तो वह पीनसरोगसे मुक्त होजाता है ॥ ११ ॥
पुटपक्वं जयापत्रं सिन्धुतैलसमायुतम् । प्रतिश्यायेषु सर्वेषु शीलितं परमौषधम् ॥ १२ ॥ जयन्तीके पत्तोंको पुटपाककी रीतिसे पकाकर रस निकालले, उसमें सैंधानमक और कडवातैल मिलाकर सर्वप्रकारके प्रतिश्यायोंमें पान करावे ॥ १२ ॥
सोष्णं गुडसंयुक्तं स्निग्धदध्यम्लभोजनम् । नवप्रतिश्यायहरं विशेषात्कफपाचनम् ॥ १३ ॥ गुडमिश्रित कालीमिरचोंका चूर्ण, स्निग्धपदार्थ, दही और खट्टे पदार्थोंका भोजन करनेसे नूतन प्रतिश्याय दूर होता है और विशेषकर कफ पकता है ॥
प्रतिश्याये नवे शस्तो यूषश्चिञ्चाच्छदोद्भवः । ततः पक्वं कफं ज्ञात्वा हरेच्छीर्षविरेचनैः ॥ १४ ॥ नये प्रतिश्याय (जुकाम) में इमलीके पत्तोंका यूष पान करना श्रेष्ठ है । जो कफ पकगया हो तो उसको शिरोविरेचन अर्थात् नस्य देकर दूर करे ॥ १४ ॥
शिरसोऽभ्यञ्जनस्वेदनस्यकद्वम्लभोजनैः । वमनैर्घृतपानैश्च तान् यथास्वमुपाचरेत् ॥ १५ ॥ इस रोगमें शिरमें मालिश, स्वेद, नस्य तथा चरपरे और खट्टे पदार्थोंका भोजन, एवं वमन और घृतपान इत्यादि क्रियाओंका यथेच्छ उपचार करे ॥ १५ ॥
भक्षयति भुक्तमात्रे सलवणसुस्विन्नमाषमत्युष्णम् । स जयति सर्वसमुत्थं चिरजातं च प्रतिश्यायम् ॥ १६ ॥