भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता ११६७

हलिसूर्यावर्त्तव्योषस्वरसेनातिपूरिते ।
कर्णे पतन्ति सहसा सर्वांस्तु कृमिजातयः ॥ २८ ॥
कलिहारीके रस और सूर्यावर्त्तके रसमें सोंठ, मिरच, पीपल इनका चूर्ण मिश्रित कर कानमें पूरनेसे सर्वप्रकारके कृमि तत्काल निकल पडते हैं ॥ २८ ॥

घृष्टं रसाञ्जनं नार्याः क्षीरेण क्षौद्रसंयुक्तम् ।
प्रशस्यते चिरोत्थेऽपि सास्रावे पूतिकर्णके ॥ २९ ॥
स्त्रीके दूधमें रसौत घिसकर उसमें शहद मिलाकर कानमें डालनेसे बहुत पुराना और स्रावयुक्त पूतिकर्णरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९ ॥

दीपिकातैल ।

महतः पञ्चमूलस्य काण्डान्यष्टाङ्गुलानि च ।
क्षौमेणावेष्ट्य संसिच्य तैलेनादीपयेत्ततः ॥ ३० ॥
यत्तैलं च्यवते तेभ्यः सुखोष्णं तत्प्रयोजयेत् ।
ज्ञेयं तद्दीपिकातैलं सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ॥ ३१ ॥
एवं कुर्याद्भद्रकाष्ठे कुष्ठे काष्ठे च सारले ।
मतिमान् दीपिकातैलं कर्णशूलनिवारणम् ॥ ३२ ॥
बेल, सोनापाठा, कुम्भेरे, पाढल और अरणी इनमेंसे किसी एक वृक्षकी आठ अँगुल लम्बी लकडी लेकर उसको रेशमीवस्त्रसे लपेटकर और तेलमें भिगोकर बत्तीके समान जलावे । उसमेंसे जो बूँदें टपकें उनको सुहाता सुहाता कानमें डाले । इस प्रकार करनेसे यह दीपिकातेल कानकी पीडाको तत्काल नष्ट करता है । इसी प्रकार देवदारु, कूठ और सरलकाठका दीपिकातेल बनाकर कानमें डालनेसे भी कर्णशूल नष्ट होता है ॥ ३०–३२ ॥

स्वर्जिकाद्यतैल ।

स्वर्जिकामूलकं शुष्कं हिंगु कृष्णा महौषधम् ।
शतपुष्पा च तैस्तैलं पक्वं शुक्तं चतुर्गुणम् ॥
प्रणादशूलबाधिर्यं स्रावं चाशु व्यपोहति ॥ ३३ ॥
सज्जी, सूखीमुली, हींग, पीपल, सोंठ और सोया इनके समान भाग मिश्रित एकसेर कल्क और चौगुनी काँजीके द्वारा दो सेर तिलके तेलको विधिपूर्वक पकावे । यह तेल कानमें डालनेसे कर्णनाद, कर्णशूल, कर्णस्राव और बाधिर्य दूर होते हैं ॥ ३३ ॥