भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६६ भैषज्यरत्नावली । [ कर्णरोग-
कर्णपाकरोगकी क्षत और विसर्परोगकी समान चिकित्सा करे । एवं कर्णकण्डू- रोगको सर्वप्रकारकी कफनाशक चिकित्सा कर दूर करे ॥ २२ ॥ क्लेदयित्वा तु तैलेन स्वेदेन प्रविलाप्य च । शोधयेत्कर्णगूथं तु भिषक् सम्यक् शलाकया ॥ २३ ॥ कर्णगूथरोगमें कानमें तेल डालकर और स्वेदितकर सूक्ष्म शलाकासे कानके मैलको खींचकर निकालदेवे ॥ २३ ॥ निर्गुण्डीस्वरसस्तैलं सिन्धुधूमरजो गुडः । पूरणात्पूतिकर्णस्य शमनो मधुसंयुक्तः ॥ २४ ॥ सिंहालूके पत्तोंका रस, कडवा तेल, सैंधानमक, घरका धुँआ, पुराना गुड और शहद इनको एकत्र मिलाकर कानमें डालनेसे पूतिकारोग अथवा कर्णपाकरोग शमन होता है ॥ २४ ॥ जातीपत्ररसे तैलं विपक्वं पूतिकर्णजित् । चमेलीके पत्तोंके रसमें कडवे तेलको पकाकर कानमें भरनेसे पूतिकर्णरोग दूर होता है ॥ वरुणार्ककपित्थाम्रजम्बूपल्लवसाधितम् । पूतिकर्णापहं तैलं जातीपत्ररसोऽथवा ॥ २५ ॥ वरना, आक, कैथ, आम और जामुन इनके पत्तोंके द्वारा तेलको पकाकर अथवा केवल चमेलीके पत्तोंके द्वारा तेलको पकाकर कानमें डालनेसे पूतिकर्णरोग आराम होता है ॥ २५ ॥ सूर्यावर्त्तकस्वरसं सिन्दुवाररसं तथा । लाङ्गलीमूलस्वरसं त्र्यूषणेनावचूर्णितम् ॥ पूरयेत्कृमिकर्णं तु जन्तूनां नाशनं परम् ॥ २६ ॥ हुलहुलका रस, सिंहालूके पत्तोंका रस अथवा कलिहारीकी जडका रस इनमेंसे किसी एकके रसमें त्रिकुटेका चूर्ण मिलाकर कानमें डालनेसे कानके कृमि नष्ट होते हैं ॥ २६ ॥ कृमिकर्णकनाशार्थं कृमिघ्नं योजयेद्विधिम् । वार्त्ताकोश्च हितो धूमः सार्षपस्नेह एव च ॥ २७ ॥ कानके कृमियोंको नष्ट करनेके लिये कृमिरोगनाशक चिकित्सा करे । एवं सूखे बैंगनके चूर्णको अग्निमें डालकर उसका धुआँ नलीद्वारा कानमें छोडे या सरसोंका तेलही डाले । इससे कृमिकर्णरोग दूर होता है ॥ २७ ॥