भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६५
पञ्चवल्कलके चूर्ण और कैथके रसको शहदमें मिलाकर कानमें डालनेसे कानका बहना दूर होता है ॥ १६ ॥
मालतिदलरसमधुना पूरितमथवा गवां मूत्रैः ।
दूरेण परिह्रियेत श्रवणयुगं पूतिरोगेण ॥ १७ ॥
चमेलीके पत्तोंके रसको शहदके साथ मिलाकर अथवा गोमूत्रके साथ मिलाकर कानोंमें डालनेसे कानोंका पूतिरोग बहुत जल्द नष्ट होता है ॥ १७ ॥
हरितालं सगोमूत्रं पूरणं पूतिकर्णजित्।
हरितालको गोमूत्रमें घिसकर कानमें डालनेसे पूतिकर्णरोग दूर होता है ॥
सर्जत्वक्चूर्णसंयुक्तः कार्पासीफलजो रसः ।
मधुना संयुक्तः साधु कर्णस्रावे प्रशस्यते ॥ १८ ॥
कपासके फलोंका रस, शालवृक्षकी छालका चूर्ण और शहद इनको एकत्र मिलाकर कर्णरन्ध्रमें डालनेसे कर्णस्रावरोग शीघ्र आरोग्य होता है ॥ १८ ॥
जम्ब्वाम्रपत्रं तरूणं समांशं कपित्थकार्पासफलं च सार्द्रम् ।
क्षुत्त्वा रसं तं मधुना विमिश्रं स्रावापहं तं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः॥१९॥
जामुन और आमके नवीन कोमल पत्ते कैथ और कपासके गीले फल इन सबको समान भाग लेकर एकत्र कूटकर रस निकाले, फिर उस रसको शहदमें मिलाकर कानमें डाले तो कानका बहना दूर होता है ॥ १९ ॥
पुटपाकविधिस्विन्नो हस्तिविङ्जातछत्रजः ।
रसः सतैलसिन्धूत्थः कर्णस्रावहरः परः ॥ २० ॥
हाथीकी लीदमें उत्पन्नहुए छत्र (साँपकी छतरी) के रसको पुटपाककी विधिसे पकाकर उसमें सरसोंका तेल और सेंधेनमकका चूर्ण मिश्रितकर कानमें भरनेसे कानका स्राव होना निवृत्त होता है ॥ २० ॥
अथ कर्णप्रतीनाहे स्नेहस्वेदौ प्रयोजयेत् ।
ततो विरिक्तशिरसः क्रियां प्राप्तां समाचरेत् ॥ २१ ॥
कर्णप्रतीनाहरोगमें प्रथम स्नेहद्रव्य और स्वेददेवे, पश्चात् नस्य देकर यथादोषा-नुसार चिकित्सा करे ॥ २१ ॥
कर्णपाकस्य भैषज्यं कुर्यात्क्षतविसर्पवत् ।
विधिश्च कफहा सर्वः कर्णकण्डूं व्यपोहति ॥ २२ ॥