भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1196, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1196
११६४भैषज्यरत्नावली ।[ कर्णरोग-

अर्कस्य पत्रं परिणामपीतमाज्येन लिप्तं शिखिनाऽवतप्तम् आपीड्य तोयं श्रवणे निषिक्तं निहन्ति शूलं बहुवेदनं च ॥१०॥ पकेहुए आकके पत्तेको घीसे ल्हेसकर अग्निमें गरमकर उसके रसको निकाले । उस रसको कानमें डालनेसे कर्णशूल और अत्यन्त पीडा नष्ट होती है ॥ १० ॥

तीव्रशूलातुरे कर्णे सशब्दे क्लेदवाहिनि । बस्तमूत्रं क्षिपेत्कोष्णं सैन्धवेनावचूर्णितम् ॥ ११ ॥ बकरेके मूत्रको सैंधेनमकके चूर्णके साथ मिलाकर कुछ एक गरम करके कानमें डाले । इससे कानकी तीव्रपीडा, शब्दका होना, पीवका बहना आदि कर्णरोगोंमें शीघ्र लाभ होता है ॥ ११ ॥

हिङ्गुतुम्बुरुशुण्ठीभिः साध्यं तैलं तु सार्षपम् । कर्णशूले प्रधानं तु पूरणं हितमुच्यते ॥ १२ ॥ हींग, धनियाँ और सोंठ इनके कल्क और चौगुने जलके साथ सरसोंके तेलको विधिपूर्वक पकावे । यह तेल कानमें डालनेसे कर्णशूलको दूर करता है ॥१२॥

कर्णनादे कर्णक्ष्वेडे कटुतैलेन पूरणम् । नादबाधिर्ययोः कुर्याद्वातशूलोक्तमौषधम् ॥ १३ ॥ कर्णनाद और कर्णक्ष्वेडरोगमें सरसोंके तेलको कानमें डाले और वातशूलोक्त औषधियोंका प्रयोग करनेसे कर्णनाद एवं बधिरताका नाश होता है ॥ १३ ॥

एष एव विधिः कार्यः प्रणादे नस्यपूर्वकः । गुडनागरतोयेन नस्यं स्यादुभयोरपि ॥ १४ ॥ कर्णमें अत्यन्त नाद होनेपर प्रथम यथाविधि नस्य देवे, फिर बधिरतानाशक क्रिया करे। दोनोंप्रकारके कर्णनादरोगोंमें गुड और सोंठ इनका क्वाथ बनाकर नस्य देना हितकारी है ॥ १४ ॥

वातोक्तं माषतैलादि बाधिर्यादौ तु योजयेत् । वर्जयेन्मैथुनं क्रोधं रूक्षं बाधिर्यपीडितः ॥ १५ ॥ बधिरतासे पीडित मनुष्य वातव्याधि अधिकारमें कहेहुए माषतैलका प्रयोग करे । इस रोगमें मैथुन और क्रोध करना एवं रूक्ष पदार्थोंका भोजन करना तत्क्षण त्याग देवे ॥ १५ ॥

चूर्णं पञ्चकषायाणां कपित्थरससंयुतम् । कर्णस्रावे प्रशंसन्ति पूरणं मधुना सह ॥ १६ ॥