भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६३


लहसुन, अदरक, सफेद सहिंजना, कच्चीमूली और केलेका स्वरस इनमेंसे किसी एकके रसको मन्दोष्णकर अथवा समुद्रफेनका चूर्ण कानमें पूरनेसे कर्णरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥

आर्द्रकसूर्यावर्त्तकशोभाञ्जनमूलकस्वरसाः ।
मधुतैलसैन्धवयुताः पृथगुक्ताः कर्णशूलहराः ॥ ४ ॥
अदरख, हुलहुल, सहिंजना अथवा कच्चीमूली इनमेंसे किसीके रसको शहद तेल और सेंधेनमकके साथ यथाक्रम मिलाकर कानमें डाले । ये प्रयोग कर्णशूलको हरनेवाले हैं ॥ ४ ॥

शोभाञ्जनस्य निर्यासस्तिलतैलेन संयुतः ।
व्यक्तोष्णः पूरणः कर्णे कर्णशूलोपशान्तये ॥ ५ ॥
सहिंजनेके क्वाथको तिलके तेलमें मिलाकर सुहाता सुहाता कानमें डालनेसे कर्णशूल शान्त होता है ॥ ५ ॥

अष्टानार्माप मूत्राणां मूत्रेणान्यतमेन च ।
कोष्णेन पूरयेत्कर्णौ कर्णशूलोपशान्तये ॥ ६ ॥
कर्णशूलको शान्तकरनेके लिये हाथी, घोडा, ऊँट, भेड, बकरी, गधा, गौ और भैंस इनमेंसे किसी एकके मूत्रको कुछ गरम करके कानमें डाले ॥ ६ ॥

अश्वत्थपत्रखल्लं वा विधाय बहुपत्रकम् ।
तैलाक्तमङ्गारपूर्णं निदध्याच्छ्रवणोपरि ॥ ७ ॥
यत्तैलं च्यवते तस्मात्खल्लादङ्गारतापितात् ।
तत्प्राप्तं श्रवणश्रोतः सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ॥ ८ ॥
पीपलके बहुतसे पत्ते लेकर उनका छिद्रविशिष्ट एक दोना बनावे । उसमें तेलको भरकर उसपर जलता हुआ अङ्गार रक्खे और उस दोनेको कानके छिद्रपर रख-देवे । जिससे अग्निके तापसे तपाहुआ दोनेसे टपकताहुआ तेल बूंदकर कानमें गिराताजाय । इस बूंदसे वेदना तत्काल नष्ट होजाती है ॥ ७ ॥ ८ ॥

अर्कपत्रपुटे दग्धस्नुहीपत्रोद्भवो रसः ।
कदुष्णः पूरणादेव कर्णशूलनिवारणः ॥ ९ ॥
आकके पत्तोंके दोनेमें थूहरके पत्तोंका रस दग्धकर सुहाता २ कानमें डाल-नेसे कानका दर्द दूर होता है ॥ ९ ॥