भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1194
११६२भैषज्यरत्नावली ।[ कर्णरोग-

स्वेद, विरेचन, वमन, गण्डूष, मुखमें घर्षण और कवल धारण करना, रुधिर निकलवाना, नस्य, धूमपान, शस्त्रक्रिया, अग्निकर्म करना, तृणधान्य ( धान्यविशेष ) पुराने जौ, मूँग, कुलथी, जङ्गली जीवोंका मांसरस, शफरीमछली, करेला, परवल, कच्चीमूली, अर्ककपूर, ताम्बूल, गरम जल, खैर, घृत, चरपरे और कडुवे द्रव्य यह सब द्रव्यसमूह मुखरोगवाले मनुष्योंको हितकर हैं ॥९६-९८॥

मुखरोगमें अपथ्य ।

दन्तकाष्ठं स्नानमम्लं मत्स्यमानूपमामिषम् ॥
दधि क्षीरं गुडं माषं रूक्षान्नं कठिनाशनम् ॥ ९९ ॥
अधोमुखेन शयनं गुर्वभिष्यन्दकारि च ।
मुखरोगेषु सर्वेषु दिवानिद्रां विवर्जयेत् ॥ १०० ॥

सर्वप्रकारके मुखरोगमें दातौन और स्नान करना, खट्टे पदार्थ, मछली, अनूपदेशीय प्राणियोंका मांस, दही, दूध, गुड, उडद, रूखा अन्न, कठिन भोजन, नीचेको मुँहकरके सोना, गुरुपाकी और कफकारी पदार्थ एवं दिनमें सोना इन सबको दन्तरोगी तत्काल त्याग देवे ॥९९॥१००॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां मुखरोगचिकित्सा ॥


कर्णरोगकी चिकित्सा ।

कपित्थमातुलुङ्गाम्लशृङ्गवेररसैः शुभैः ।
सुतोष्णैः पूरयेत्कर्णं कर्णशूलोपशान्तये ॥ १ ॥

कैथ, बिजौरे नींबूका रस, काँजी अथवा अदरखका रस इनमेंसे किसी एककों कुछ गरम करके कानमें डालनेसे कानकी पीडा दूर होती है ॥ १ ॥

शृङ्गवेरं च मधु च सैन्धवं तैलमेव च ।
कदुष्णं कर्णयोर्धार्यमेतत्स्याद्वेदनापहम् ॥ २ ॥

अदरखका रस, शहद, सेंधानमक और तिलका तेल इनको एकत्र पकाकर सुहाता २ कानोंमें डाले तो कानकी पीडा नष्ट होती है ॥ २ ॥

लशुनाईकशिग्रूणां सुरङ्गया मूलकस्य च ।
कदल्याः स्वरसः श्रेष्ठः कदुष्णः कर्णपूरणे ॥
समुद्रफेनचूर्णेन युक्त्या वाप्यवचूर्णयेत् ॥ ३ ॥