भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११६१


सेवन करनेके पश्चात् जलपीपलके कल्कसे मुखको अच्छेप्रकार घर्षण करे तो मुखकें सब रोग दूर होते हैं ॥ ९० ॥ ९१ ॥

महासहचरतैल ।

तुलां धृतां नीलसहाचरस्य द्रोणेऽम्भसः संश्रपयेद्यथावत् ।
पूते चतुर्भांगरसे तु तैलं पचेच्छनैर्द्धर्द्धपलप्रमाणैः ॥ ९२ ॥
कल्कैरनन्ताखदिरेरिमेदजम्ब्वाम्रयष्टीमधुकोत्पलानाम् ।
तत्तैलमाश्वेव धृतं मुखेन स्थैर्य्यं द्विजानां विदधाति सद्यः ॥ ९३ ॥

नीलीकटसरैयाको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें यथाविधि पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तेल दो सेर एवं अनन्तमूल,खैरसार, दुर्गन्ध खैरकी छाल, जामुनकी छाल, आमकी छाल, मुलहठी और नीलकमल इन औषधियोंके दो दो तोले प्रमाण कल्कको डालकर उत्तम प्रकार तेलको सिद्ध करे । इस तेलको मुखमें धारण करनेसे तत्काल दाँतोंकी जडें दृढ होजाती हैं ॥९२॥९३॥

बकुलाद्यतैल ।

बकुलस्य फलं लोध्रं वज्रवल्ली कुरुण्टकम् ॥
चतुरङ्गुलबब्बोलवाजिकर्णैरिमासनम् ॥ ९४ ॥
एषां कषायकल्काभ्यां तैलं पक्वं मुखे धृतम् ।
स्थैर्य्यं करोति चलतां दन्तानां धावनेन च ॥९५॥

मौलसिरीके फल, लोध, हडसंहारी, नीली कटसरैया, अमलतास, बबूलकी छाल, शालवृक्षकी छाल, दुर्गन्ध खैरकी छाल, और विजयसार इनके क्वाथ और कल्कके द्वारा विधिपूर्वक तेलको सिद्ध करके मुखमें धारण करे अथवा नास लेवे तो यह तेल हिलतेहुए दाँतोंको शीघ्र स्थिर करदेता है ॥९४॥९५॥

मुखरोगमें पथ्य ।

स्वेदो विरेको वमनं गण्डूषः प्रतिसारणम् ।
कवलोऽसृक्स्रुतिर्नस्यं धूमः शस्त्राग्निकर्मणी ॥ ९६ ॥
तृणधान्यं यवा मुद्गाः कुलत्था जाङ्गला रसाः ।
बृहत्प्रोष्ठी कारवेल्लं पटोलं बालमूलकम् ॥ ९७ ॥
कर्पूरनीरं ताम्बूलं तप्ताम्बु खदिरो घृतम् ।
कटु तिक्तं च वर्गोऽयं मित्रं स्यान्मुखरोगिणाम् ॥ ९८ ॥