भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७५

चीता, चव्य, अजवायन, कटेरी, करञ्जके बीज सैंधानमक और आकका दूध इन औषधियोंके कल्क एवं गोमूत्रके द्वारा कडवे तैलको यथारीति सिद्ध करे । फिर उस तेलको नासार्शरोगकी शान्तिके लिये नस्यद्वारा व्यवहार करे ॥

नासारोगमें पथ्य ।

स्थितिर्निर्वातनिलये प्रगाढोष्णीषधारणम् ।
गण्डूषो लंघनं नस्यं धूमश्चर्द्धिः शिराव्यधः ॥ २८ ॥
कटुचूर्णं नासारन्ध्रे निक्षिप्यान्तः प्रवेशनम् ।
स्वेदः स्नेहःशिरोऽभ्यङ्गः पुराणा यवशालयः ॥ २९ ॥
कुलत्थमुद्गयोर्यूषो ग्राम्यजाङ्गलजा रसाः ।
वार्त्ताकुः कुलकं शिग्रुः कर्कोटं बालमूलकम् ॥ ३० ॥
लशुनं दधि तप्ताम्बु वारुणी च कटुत्रयम् ।
कट्वम्ललवणं स्निग्धमुष्णं लघु च भोजनम् ॥
नासारोगे पीनसौ सेव्यमेतद्यथामलम् ॥ ३१ ॥

वायुरहित स्थानमें रहना, शिरमें पगडी या मोटा कपडा बाँधना, गण्डूष, लंघन, नस्य, धूमपान वमन और शिरावेध करना, कटुद्रव्योंका चूर्ण नासिकाके छिद्रोंमें डालकर छींकें लेना, स्वेद देना, स्नेहप्रयोग, शिरमें मालिश करना, पुराने जौ, शालिचावल, कुलथीका और मूँगका यूष, ग्रामीण और जङ्गली जीवोंका मांसरस, बैंगन, परवल, सहिंजना, ककोडे, कच्ची मूली, लहसुन, दही, गरम जल, मद्य, त्रिकुटा, चरपरे, खट्टे, नमकीन, स्निग्ध, गरम और हल्का भोजन ये सब वस्तुएँ यथादोषानुसार सेवन करनेसे पीनस और नासारोगमें हित करनेवाली हैं ॥२८-३१॥

नासारोगमें अपथ्य ।

विरुद्धानि दिवास्वप्नमभिष्यन्दि गुरूणि च ।
स्नानं क्रोधं शकृन्मूत्रबाष्पवेगाञ्छुचं द्रवम् ॥
भूशय्यामपि यत्नेन नासारोगी परित्यजेत ॥ ३२ ॥

विरुद्ध द्रव्योंका भोजन, दिनमें सोना, कफकारक और गुरुपाकी द्रव्य, स्नान, क्रोध करना, मल, मूत्र, और आँसुओंके वेगको रोकना, शोक करना, पतले पदार्थोंका सेवन और पृथ्वीमें सोना इन सबको नासारोगी यत्नपूर्वक त्याग देवे ॥ ३२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् नासारोगचिकित्सा ॥