भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११७६ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-
नेत्ररोगकी चिकित्सा ।
लङ्घनालेपनस्वेदशिराव्यधविरेचनैः ।
उपाचरेदभिष्यन्दानञ्जनाश्च्योतनादिभिः ॥ १ ॥
लङ्घन ( लघु अन्नका आहार या उपवास ), प्रलेप, स्वेद, शिरावेध विरेचन, अञ्जन और आश्च्योतन ( औषधियोंका रस टपकाना ) आदि उपचारोंसे नेत्राभिष्यन्दरोगीकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १ ॥
श्रीवामातिविलोघ्रैश्चूर्णितैरल्पसैन्धवैः ।
अव्यक्तेऽक्षिगदे कार्यं प्रोतस्थैर्गुण्डनं बहिः ॥ २ ॥
नेत्ररोगके पूर्वरूपमें देवदारु, अतीस, लोध इनके चूर्णको समान भाग लेकर उसमें कुछ थोडासा सैंधानमक मिलाकर पोटली बनाले । फिर उस पोटलीको पलकोंके ऊपर बारम्बार फिरावे ॥ २ ॥
अक्षिकुक्षिभवा रोगाः प्रतिश्यायव्रणज्वराः ।
पञ्चैते पञ्चरात्रेण प्रशमं यान्ति लङ्घनात् ॥ ३ ॥
नेत्ररोग, कुक्षिजन्यरोग, प्रतिश्याय, व्रण और ज्वर ये पाँच प्रकारके रोग लङ्घन करनेसे पाँचदिनमें शान्त होजाते हैं ॥ ३ ॥
स्वेदः प्रलेपस्तिक्तान्नं सेको दिनचतुष्टयम् ।
लङ्घनं चाक्षिरोगाणामामानां पाचनानि षट् ॥
अञ्जनं पूरणं क्वाथपानमामे न शस्यते ॥ ४ ॥
स्वेद, प्रलेप, तिक्त द्रव्योंका भोजन, सेंक करना, चार दिनतक उपेक्षा करना ( अर्थात् ४ दिनतक आँखमें न कुछ लगाना और न डालना ) तथा लङ्घन ये छः कर्म्म नेत्रोंके आमदोषको पकाते हैं । आम ( नेत्रोंकी अपक्व अवस्था ) में नेत्रोंमें अञ्जन आँजना या अन्य किसी प्रकारकी औषधि डालना और क्वाथ पान करना श्रेष्ठ नहीं है । तात्पर्य यह है कि, उपर्युक्त सेकादि पाँच प्रकारकी क्रिया नेत्रोंकी अपक्व अवस्थामें ४ दिनतक करनी चाहिये । चार दिनके बाद रोगीके अञ्जन लगाना, आँखें भरना और क्वाथ पान कराना आदि व्यवस्था करनी चाहिये ॥४॥
धात्रीफलनिर्यासो नवहृक्कोपं निहन्ति पूरणतः ।
सक्षौद्रसैन्धवो वा शिग्रुद्रवपत्ररससेकः ॥ ५ ॥