भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७७
आमलौंका रस आँखोंमें डाले अथवा सहिंजनेके पत्तोंका रस, शहद और कुछ सैंधानमक इनको एकत्र मिलाकर आँखोंपर सेक करे तो नवीन नेत्ररोग नष्ट होता है ॥ ५ ॥
दार्वी रसाञ्जनं वापि स्तन्ययुक्तं प्रपूरणम् ।
निहन्ति शीघ्रं दाहाश्रुवेदनाः स्यन्दसम्भवाः ॥ ६ ॥
दारुहल्दीके क्वाथमें रसौत और स्त्रीका दूध डालकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंकी दाह, जलस्राव और पीडा नष्ट होती है ॥ ६ ॥
करवीरतरुणकिसलयभेदोद्भवसलिलसम्पूर्णम् ।
नयनयुगं भवति दृढं सहसैव तत्क्षणात्कुपितम् ॥ ७ ॥
कनेरके नवीन पत्तोंको तोडनेसे जो रस निकले उसको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्र तत्काल आरोग्य और दृढ होजाते हैं ॥ ७ ॥
शिखरिजमूलं ताम्रकभाजन ईषच्च सैन्धवोन्मिश्रम् ।
मस्तुनिघृष्टं भरणाद्धरति च नवलोचनोत्कोपम् ॥ ८ ॥
चिरचिटेकी जडको दहीके तोडके साथ ताँबेके पात्रमें घिसकर उसमें कुछएक अर्थात् रत्तीभर सैंधेनमकका चूर्ण मिलाकर आँखोंमें भरनेसे नया नेत्राभिष्यन्दरोग दूर होता है ॥ ८ ॥
सैन्धवदारुहरिद्रागैरिकपथ्यारसाञ्जनैः पिष्टैः ।
दत्तो बहिः प्रलेपो भवत्यशेषाक्षिरोगहरः ॥ ९ ॥
दारुहल्दी, गेरू, हरड और रसौत इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर उसमें किञ्चित् सैंधानमक मिलावे, फिर सबको बारीक कपडेमें बाँधकर पोटली बनालेवे। उस पोटलीको नेत्रोंके बाहर अर्थात् पलकोंपर फिरानेसे नेत्रोंके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
तथा सावरकं लोध्रं घृतभृष्टं बिडालकः ।
कार्या हरीतकी तद्वद् घृतभृष्टो बिडालकः ॥
शालकोऽक्ष्णोर्बहिर्लेपो बिडालक उदाहृतः ॥१०॥
घीमें भुनेहुए सफेद लोधको घीमें पीसकर पलकोंपर लेपकरे अथवा घीमें भुनीहुई हरडको पीसकर नेत्रोंके पलकोंपर लेप करे तो नेत्ररोग नष्ट होता है। नेत्रोंके बाहर पलकोंपर जो औषधि लगाई जाती है उसको बिडालक कहते हैं ॥ १० ॥
गिरिमृच्चन्दननागरखटिकामृदंशतो बहिर्लेपः ।
कुरुते वचया मिश्रो लोचनमगदं न सन्देहः ॥ ११ ॥