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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७७

आमलौंका रस आँखोंमें डाले अथवा सहिंजनेके पत्तोंका रस, शहद और कुछ सैंधानमक इनको एकत्र मिलाकर आँखोंपर सेक करे तो नवीन नेत्ररोग नष्ट होता है ॥ ५ ॥

दार्वी रसाञ्जनं वापि स्तन्ययुक्तं प्रपूरणम् ।
निहन्ति शीघ्रं दाहाश्रुवेदनाः स्यन्दसम्भवाः ॥ ६ ॥

दारुहल्दीके क्वाथमें रसौत और स्त्रीका दूध डालकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंकी दाह, जलस्राव और पीडा नष्ट होती है ॥ ६ ॥

करवीरतरुणकिसलयभेदोद्भवसलिलसम्पूर्णम् ।
नयनयुगं भवति दृढं सहसैव तत्क्षणात्कुपितम् ॥ ७ ॥

कनेरके नवीन पत्तोंको तोडनेसे जो रस निकले उसको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्र तत्काल आरोग्य और दृढ होजाते हैं ॥ ७ ॥

शिखरिजमूलं ताम्रकभाजन ईषच्च सैन्धवोन्मिश्रम् ।
मस्तुनिघृष्टं भरणाद्धरति च नवलोचनोत्कोपम् ॥ ८ ॥

चिरचिटेकी जडको दहीके तोडके साथ ताँबेके पात्रमें घिसकर उसमें कुछएक अर्थात् रत्तीभर सैंधेनमकका चूर्ण मिलाकर आँखोंमें भरनेसे नया नेत्राभिष्यन्दरोग दूर होता है ॥ ८ ॥

सैन्धवदारुहरिद्रागैरिकपथ्यारसाञ्जनैः पिष्टैः ।
दत्तो बहिः प्रलेपो भवत्यशेषाक्षिरोगहरः ॥ ९ ॥

दारुहल्दी, गेरू, हरड और रसौत इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर उसमें किञ्चित् सैंधानमक मिलावे, फिर सबको बारीक कपडेमें बाँधकर पोटली बनालेवे। उस पोटलीको नेत्रोंके बाहर अर्थात् पलकोंपर फिरानेसे नेत्रोंके समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥

तथा सावरकं लोध्रं घृतभृष्टं बिडालकः ।
कार्या हरीतकी तद्वद् घृतभृष्टो बिडालकः ॥
शालकोऽक्ष्णोर्बहिर्लेपो बिडालक उदाहृतः ॥१०॥

घीमें भुनेहुए सफेद लोधको घीमें पीसकर पलकोंपर लेपकरे अथवा घीमें भुनीहुई हरडको पीसकर नेत्रोंके पलकोंपर लेप करे तो नेत्ररोग नष्ट होता है। नेत्रोंके बाहर पलकोंपर जो औषधि लगाई जाती है उसको बिडालक कहते हैं ॥ १० ॥

गिरिमृच्चन्दननागरखटिकामृदंशतो बहिर्लेपः ।
कुरुते वचया मिश्रो लोचनमगदं न सन्देहः ॥ ११ ॥

११७८ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

गेरू, लालचन्दन, सोंठ, खडिया मिट्टी और वच इनको सम भाग लेकर एकत्र पीसकर आँखोंके बाहर पलकोंपर लेप करनेसे नेत्ररोग निस्सन्देह नष्ट होता है ॥

भूम्यामलकी घृष्टा सैन्धवगृहवारियोजिता ताम्रे ।
याता घनत्वमक्ष्णोर्जयति बहिर्लेपतः पीडाम् ॥ १२ ॥

भुईं आमला और सेंधानमक इनको काँजीके द्वारा ताँबेके पात्रमें घिसे। जब घिसते घिसते खूब गाढा होजाय तब उसका नेत्रोंपर लेप करे । यह लेप नेत्रपीडाको दूर करता है ॥ १२ ॥

आश्च्योतनं मारुतजे क्वाथो बिल्वादिभिर्हितः ।
कोष्णः सैरण्डबृहतीतर्कारीमधुशिग्रुभिः ॥ १३ ॥

वातज नेत्ररोगमें बिल्वादिपञ्चमूल, अण्डकी जड, बडी कटेरी, जयन्ती और सहिंजनेकी छाल इनके क्वाथमें शहद डालकर उसके द्वारा आश्च्योतनकर्म करना अर्थात् सुहाता २ नेत्रोंमें डालना हितकर है ॥ १३ ॥

एरण्डपल्लवे मूले त्वचि वाऽऽजापयः शृतम् ।
कण्टकार्याश्च मूलेषु सुखोष्णं सेचने हितम् ॥ १४ ॥

अण्डके पत्ते, जड, छाल और कटेरीकी जड इन सबने साथ बकरीके दूधको पकाकर उसको सुहाता २ लेकर नेत्रोंमें सेकन करनेसे सुख होता है ॥ १४ ॥

संपक्वेऽक्षिगदे कार्यमञ्जनादिकमिष्यते ।
प्रशस्तवर्त्मता चाक्ष्णोः संरम्भाश्रुप्रशान्तता ॥
मन्दवेदनता कण्डूः पक्वाक्षिगदलक्षणम् ॥ १५ ॥

नेत्ररोगकी पक्व अवस्थामें अञ्जनादिका व्यवहार करना हितकारी है । नेत्रोंकें मार्गमें प्रशस्तता, शोथ, आँसुओंके वेगकी शान्ति एवं खुजली और वेदनाका मन्द मन्द होना ये सब पक्व नेत्ररोगके लक्षण जानने चाहिये ॥ १५ ॥

बृह्त्येरण्डमुलत्वक् शिग्रोर्मूलं ससैन्धवम् ।
अजाक्षीरेण पिष्टं स्याद्वर्त्तिर्वाताक्षिरोगनुत् ॥ १६ ॥

बडी कटेरीकी जडकी छाल, अण्डकी जडकी छाल, सहिंजनेकी जडकी छाल और सेंधानमक इनको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें खरल करके बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको आँखोंमें लगानेसे वातज नेत्ररोग नष्ट होता है ॥ १६ ॥

हरिद्रे मधुकं द्राक्षां देवदारु च पेषयेत् ।
आजेन पयसा श्रेष्ठमभिष्यन्दे तदञ्जनम् ॥ १७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११७९

हल्दी, दारुहल्दी, मुलहठी, दाख और देवदारु इन सबको बकरीके दूधके साथ पीसकर आँखोंमें आँजनेसे अभिष्यन्द (नेत्रोंका दुखना) रोग दूर होता है ॥

गैरिकं सैन्धवं कृष्णा तगरं च यथोत्तरम् । पिष्टं द्विरंशतोऽद्विर्वा गुडिकाऽञ्जनमिष्यते ॥ १८ ॥

गेरू एक माशा, सैंधानोन दो मासे, पीपल चार मासे और तगर आठ माशे इनको एकत्र बकरीके दूधमें अथवा जलमें पीसकर गोली बनालेवे । उस गोलीकों घिसकर आँखोंमें लगानेसे नेत्ररोगमें शीघ्र लाभ होता है ॥ १८ ॥

प्रपौण्डरीकयष्ट्याह्न निशामलकपद्मकैः । शीतैर्मधुसमायुक्तैः सेकः पित्ताक्षिरोगनुत् ॥ १९ ॥

पुण्डरिया, मुलहठी, हल्दी, आमले और पद्माख इनके शीतल क्वाथमें मधु मिश्रित कर नेत्रोंपर सेचन करनेसे पित्तज नेत्ररोग नष्ट होता है ॥ १९ ॥

द्राक्षामधुकमञ्जिष्ठाजीवनीयैः शृतं पयः । प्रातराश्च्योतनं शस्तं शोथशूलाक्षिरोगिणाम् ॥ २० ॥

दाख, मुलहठी, मंजीठ और जीवनीयगणकी समस्त औषधि इन सबके साथ यथानियम दूधको पकाकर प्रातःसमय उससे नेत्रोंको सिञ्चन करे । इससे नेत्रोंकी सूजन और शूल नष्ट होता है ॥ २० ॥

निम्बस्य पत्रैः परिलिप्य लोध्रं स्वेद्याग्निना चूर्णमथापि कल्कम् । आश्च्योतनं मानुषदुग्धयुक्तं पित्तास्रवातापहमुग्रमुक्तम् ॥ २१ ॥

नीमके पत्तोंको पीसकर उसका गोलासा बनाले, उस गोलेमें लोधका चूर्ण भरकर और उसको केलेके पत्तोंसे लपेटकर प्रज्वलित अग्निमें पकावे । फिर कुछ देरके बाद निकालकर उसमें स्त्रीका दूध मिलाकर तरल करके उसको वस्त्रमें छान लेवे । इसको नेत्रोंमें टपकानेसे रक्तपित्त और चक्षुरोग शमन होता है ॥ २१ ॥

कफजे लङ्घनं स्वेदो नस्यं तिक्तान्नभोजनम् । तीक्ष्णैः प्रधमनं कुर्यात्तीक्ष्णैश्चैवोपनाहनम् ॥ २२ ॥

कफजनित चक्षुरोगमें लंघन, स्वेद, नस्य, तिक्तरसवाले अन्नोंका भोजन एवं तीक्ष्ण द्रव्योंसे प्रधमन (नलद्वारा फूँकना) और तीक्ष्ण द्रव्योंका प्रलेप करना उपयोगी है ॥ २२ ॥

फणिज्झकास्फोतकपित्थबिल्वपत्तरपीलूसुरसार्जभङ्गैः । स्वेदं विदध्यादथवा प्रलेपं बर्हिष्ठशुण्ठीसुरदारुकुष्ठैः ॥ २३ ॥

११८० भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग

वनतुलसी विशेष, आस्फोतलता, कैथ, बेल, शालिश्चशाक, पीलुवृक्ष, तुलसी और अर्ज (तुलसीभेद) इनमेंसे किसी एक वृक्षके पत्तोंको पीसकर कुछएक गरम करके नेत्रोंके बाहर पलकोंपर सेक करे अथवा सुगन्धवाला, सोंठ, देवदारु और कूठ इनको एकत्र पीसकर पलकोंपर लेप करे तो नेत्ररोग दूर होता है ॥२३॥

शुण्ठीनिम्बदलैः पिण्डः सुखोष्णैः स्वल्पसैन्धवैः ।
धार्यश्चक्षुषि संक्षेपाच्छोथकण्डूव्यथापहः ॥ २४ ॥

सोंठ और नीमके पत्तोंको एकत्र पीसकर उसमें थोडासा सैंधानमक डालकर गोलासा बनावे। उस गोलेको गरम करके सुहाता २ कपडेमें बांधकर आँखोंके ऊपर धारण करनेसे नेत्रोंकी सूजन, खुजली और पीडा नष्ट हो जाती है ॥

वल्कलं पारिजातस्य तैलकाञ्जिकसैन्धवम् ।
कफोद्भूताक्षिशूलघ्नं तरुघ्नं कुलिशं यथा ॥ २५ ॥

फरहदकी छालका रस, कडवा तेल, काँजी और सैंधानमक इन सबको एकत्र मिलाकर जब खूब गाढा न हो जाय तबतक ताँबेके पात्रमें कौडीसे खरल करे । फिर इस अञ्जनको आँखोंमें अँजे तो यह कफसे उत्पन्नहुए नेत्रोंके शूलको इस प्रकार नष्ट करदेता है, जिसप्रकार वज्र वृक्षको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ २५ ॥

ससैन्धवं लोध्रमथाज्यभृष्टं सौवीरपिष्टं सितवस्त्रबद्धम् ।
आश्च्योतनं तन्नयनस्य कार्यं कण्डूं च दाहं च रुजां च हन्यात् ॥

सैंधानमक और लोध इनको घृतमें भूनकर काँजीमें पीसकर सफेद कपडेमें बांधकर पोटली बनालेवे । फिर उस पोटलीमेंसे निष्पीडित रसको नेत्रोंमें टपकावे । इससे खुजली, दाह और नेत्रपीडा कम होती है ॥ २६ ॥

स्निग्धैरुष्णैश्च वातोत्थः पित्तजो मृदुशीतलैः ।
तीक्ष्णरूक्षोष्णविशदैः प्रशाम्यन्ति कफात्मकः ॥
तीक्ष्णोष्णमृदुशीतानां शान्तः स्यात्सान्निपातिकः ॥ २७ ॥

वातज नेत्ररोगमें स्निग्ध और उष्णक्रिया, पित्तज नेत्ररोगमें मृदु और शीतल क्रिया, कफज नेत्ररोगमें तीक्ष्ण, उष्ण और रूक्ष क्रिया एवं त्रिदोषज नेत्ररोगमें तीनों दोषोंकी मिलीहुई चिकित्सा करनेसे उक्त रोग शमन होते हैं ॥ २७ ॥

तिरीटत्रिफलायष्टिशर्कराभद्रमुस्तकैः ।
पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ॥ २८ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८१

सफेद लोध, हरड, बहेड़ा, आमला, मुलहठी, चीनी और नागरमोथा इनको एकत्र उत्तम प्रकारसे कूट पीसकर कुछ एक शीतल जलमें घोलकर नेत्रोंपर सेचन करे तो इससे रक्तजनित नेत्ररोग नाश होता है ॥ २८ ॥

कशेरुमधुकानां च चूर्णमम्बरसंवृतम् ।
न्यस्तमप्स्वान्तरिक्षासु हितमाश्च्योतनं भवेत् ॥२९॥

कशेरू और मुलहठीके चूर्णकी पोटली बनाकर उसको वर्षाके जलमें भिजोकर नेत्रोंमें सेचन करे तो रक्तज चक्षुरोग आराम होता है ॥ २९ ॥

दार्बी पटोलं मधुकं सनिम्बं पद्मकोत्पलम् ।
प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत्तोये चतुर्गुणे ॥ ३० ॥
विपाच्य पादशेषं तु तं पुनः कुडवं पचेत् ।
शीतीभूते तत्र मधु दद्यात्पादांशिकं ततः ॥
रसक्रियैषा दाहाश्रुरोगशोथरुजापहा ॥ ३१ ॥

दारुहल्दी, पटोलपत्र, मुलहठी, नीमके पत्ते, पद्माख, नील कमल और पुण्डरिया इन सबको समान भाग मिश्रित चार पल लेकर चौगुने जलमें पकावे । जब पककर चौथाईभाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर एक कुडव परिणाम उस क्वाथको दूसरीवार पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें चार तोले शहद मिलादेवे । यह रसक्रिया है । इसको आँखोंमें लगानेसे दाह, अश्रुपात, सूजन, वेदना और रक्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥

तिक्तस्य सर्पिषः पानं बहुशश्च विरेचनम् ।
अक्ष्णोरपि समन्ताच्च पातनं तु जलौकसः ॥
पित्ताभिष्यन्दशमनो विधिश्चाप्युपपादितः ॥ ३२ ॥

रक्तज अभिष्यन्दमें तिक्त (वक्ष्यमाण पटोलादि) घृतकों पान करना, वारंवार विरेचन और नेत्रोंके चारों ओर जोंक लगवाकर रक्त निकलवाना एवं पित्तज अभिष्यन्दनाशक समस्त क्रिया करना श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥

शिग्रुपल्लवनिर्यासः सुघृष्टस्ताम्रसम्पुटे ।
घृतेन धूपितो हन्ति शोथघर्षाश्रुवेदनाः ॥ ३३ ॥

सहिंजनेके पत्तोंके रसको ताँबेके संपुटमें घिसे । फिर घृतमें मिलाकर उसकी धूप देवे तो इससे नेत्रोंकी सूजन, पीडा और आँसुओंका गिरना दूर होता है ॥ ३३ ॥

११८४भैषज्यरत्नावली ।[ नेत्ररोग-

पिष्टैर्निम्बस्य पत्रैरतिविमलतरैर्जातिसिन्धूत्थमिश्रै-
रन्तर्गर्भं दधाना पटुतरगुडिका पिष्टलोध्रेण भृष्टा ।
तूलैः सौवीरसान्द्रैरतिशयसृदुभिर्वेष्टिता सा समन्ता-
च्चक्षुःकोपप्रशान्तिं चिरमुपरि दृशोर्भ्राम्यमाणा करोति ॥३४॥
नीमके पत्ते, चमेलीके फूल और सेंधानमक इनको एकत्र पीसकर गोलासा बनावे । उस गोलेके बीचमें घीमें भूनकर लोधके चूर्णको रखकर गुटिका बनावे । फिर उस गुटिकाको काँजीमें भिजाई हुई रुईके द्वारा चारों ओरसे लपेटकर नेत्रोंके ऊपर बारबार फिरावे । यह गुटिका बहुत पुराने चक्षुरोगको शीघ्र नष्ट कर देती है ॥ ३४ ॥

बिल्वपत्ररसं साम्लं निघृष्टं ताम्रभाजने ।
सिन्धूत्थकटुतैलाक्तं कुर्यान्नेत्रस्रवादिषु ॥ ३५ ॥
बेलपत्रीके रस, काँजी, सेंधेनमक और कडवे तेलको एकत्रकर ताँबेके बर्त्तनमें अच्छेप्रकार घिसकर नेत्रोंमें लगावे । यह प्रयोग नेत्रस्राव होनेमें विशेष हितकर है ॥

सलवणकटुतैलं काञ्जिकं कांस्यपात्रे घनितमुपलघृष्टं
धूपितं गोमयाग्नौ । सपवनकफकोपं छागदुग्धावसिक्तं
जयति नयनशूलं स्रावशोथं सरागम् ॥ ३६ ॥
सेंधानमक, कडवा तेल और काँजी इनको काँसेके पात्रमें पत्थरसे घोटे, जब घोटते २ खूब गाढा होजाय तब आरने उपलोंकी अग्निमें डालकर धूप देवे और बकरीके दूधमें मिलाकर आँखोंमें लगावे । इससे वातज और कफज नेत्रशूल, स्राव, शोथ और लाली दूर होती है ॥ ३६ ॥

तरुस्थविद्धामलकरसः सर्वाक्षिरोगनुत् ।
पुराणं सर्वथा सर्पिः सर्वनेत्रामयापहम् ॥ ३७ ॥
आमलॉँके पेडमें सुई छेदकर रस निकाले, उस रसको आँजनेसे सर्वप्रकारके नेत्ररोग नष्ट होते हैं । एवं पुराने घीको पान, नस्य और लगानेसे सर्वनेत्ररोग दूर होते हैं ॥ ३७ ॥

अयमेव विधिः सर्वो मन्थादिष्वपि शस्यते ।
अशान्तौ सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् ॥ ३८ ॥
यही उपर्युक्त समस्त विधि अधिमन्थरोगमें भी करनी चाहिये । यदि उक्तक्रियाके द्वारा अधिमन्थरोग शान्त न हो तो दोनों भौंहोंके ऊपर दाग देवे ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८४

जलौकापातनं शस्तं नेत्रपाके विरेचनम् ।
शिरावेधं प्रकुर्वीत सेकलेपांश्च शुक्रवत् ॥ ३९ ॥
नेत्ररोगकी पक्क अवस्था में जोंक लगवाकर रक्तमोक्षण, विरेचन ( दस्त ) और शिरावेध करे एवं नेत्रशुक्रकी समान सेक और प्रलेप करे ॥ ३९ ॥

विभीतकशिवाधात्रीपटोलारिष्टवासकैः ।
क्वाथो गुग्गुलुना पेयःशोथपाकाक्षिशूलहा ॥ ४० ॥
पिल्वं च सव्रणं शुक्लं रागादींश्चापि नाशयेत् ।
एतैश्चापि घृतं पक्वं रोगांस्तांश्च व्यपोहति ॥ ४१ ॥
बहेडा, हरड, आमला, पटोलपात, नीमकी छाल, और अडूसेकी छाल इनके द्वारा सिद्ध कियाहुआ क्वाथ गूगल डालकर पीनेसे नेत्रोंकी सूजन, नेत्रपाक, शूल, पिल्व, व्रण, शुक्र, और लालीको नष्ट करता है अथवा उक्त समस्त द्रव्योंके क्वाथ और गूगलके कल्क द्वारा सिद्ध कियेहुये घृतको सेवन करनेसेभी उल्लिखित सम्पूर्ण दोष नष्ट होते हैं ॥ ४० ॥ ४१ ॥

नेत्रे त्वभिहते कुर्याच्छीतमाश्च्योतनादिकम् ॥
अभिघातजनित नेत्ररोगमें शीतलद्रव्यों द्वारा नेत्रमें आश्च्योतनादि कर्मकरे ॥

दृष्टिप्रसादजननं विधिमाशु कुर्यात् स्निग्धैर्हिमैश्च मधुरैश्च तथा प्रयोगैः । स्वेदाग्निधूमभयशोक रुजा-
भितापैरभ्याहतानपि तथैव भिषक् चिकित्सेत् ॥ ४२ ॥
धूप, अग्नि, धुआँ, भय, शोक, आघात और अभिताप इन कारणोंसे उत्पन्न हुए नेत्ररोगमें स्निग्ध, शीतल और मधुरद्रव्योंका प्रयोग एवं दृष्टिको निर्मल करनेवाली विधि शीघ्रही करनी चाहिये ॥ ४२ ॥

आगन्तुदोषं प्रसमीक्ष्यकार्यं वक्त्रोष्मणा स्वेदनमादि-
तस्तु । आश्च्योतनं स्त्रीपयसा च सद्यो यच्चापि पित्त-
क्षतजापहं स्यात् ॥ ४३ ॥
धूल आदिके पडजानेसे नेत्राभिष्यन्द हुआ हो तो प्रथम मुँहकी भापसे फूँक फूँककर स्वेद देवे। फिर स्त्रीका दूध आँखोंमें टपकावे और पित्तज अभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्दके समान चिकित्सा करे ॥ ४३ ॥

सूर्योपरागानलविद्युदादिविलोकनेनापि हतेक्षणस्य ।
सतर्पणं स्निग्धहिमादि कार्यं सायं निषेव्यास्त्रिफलाप्रयोगाः ॥

११८४ | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग-

सूर्यग्रहण, अग्नि और बिजली इनको अधिक देखनेसे नेत्रोंमें पीडा होनेपर सन्तर्पण एवं स्निग्ध और शीतल क्रिया करे । सायंकालमें त्रिफलाके क्वाथसे नेत्रोंकों सिञ्चन करने अथवा उक्त क्वाथको पीनेसे विशेष उपकार होता है ॥ ४४ ॥

निशाब्दत्रिफलादार्बीसितामधुकसंयुतम् ।
अभिघाताक्षिशूलघ्नं नारीक्षीरेण पूरणम् ॥ ४५ ॥

हल्दी, नागरमोथा, त्रिफला, दारुहल्दी, मिश्री, और मुलहठी इनके चूर्णोंको समान भाग लेकर स्त्रीके दूधमें मिलाकर आँखोंमें भरनेसे अभिघातज नेत्रशूल नष्ट होता है ॥ ४५ ॥

वाताभिष्यन्दवच्चापि वाते मारुतपर्यये ।
पूर्वभक्तं हितं सर्पिःक्षीरं चाप्यथ भोजने ॥ ४६ ॥

अन्यतोवात और वातपर्यायरोगमें वातज अभिष्यन्दके समान चिकित्सा करे और भोजन करनेसे पहले घृतपान तथा भोजनके पश्चात् दुग्धपान करे ॥

वृक्षादन्यां कपित्थे च पञ्चमूले महत्यपि ।
सक्षीरं कर्कटरसे सिद्धं चापि पिबेद् घृतम् ॥ ४७ ॥

बाँदा, कैथ, बृहत्पञ्चमूल इनके कल्क और काकड़ासिंगीके क्वाथमें दूध सहित घृतको पकावे । इस घृतको आगन्तुक नेत्ररोगमें पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ४७ ॥

अधिमन्थमभिष्यंदं रक्तोत्थमथवाऽर्जुनम् ।
शिरोत्पातं शिराहर्षमन्यांश्चोग्रभवान् गदान् ॥
स्निग्धस्याज्येन कौम्भेन शिरावेधैः शमं नयेत् ॥ ४८ ॥

रक्तज अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अर्जुन, शिरोत्पात, शिराहर्ष एवं अन्यान्य घोरतर नेत्ररोगोंको दस वर्षके पुराने घृतको सेवनकर और मस्तकंकी शिराको वेधकर तथा पित्तज अभिष्यन्दनाशक अन्यान्य क्रियाओंको करके नष्ट करना ॥

अम्लाध्युषितशान्त्यर्थं कुर्याल्लेपान्सुशीतलान् ।
तैन्दुकं त्रैफलं सर्पिर्जीर्णं वा केवलं हितम् ।
शिरावेधं विना कार्यः पित्तस्यन्दहरो विधिः ॥ ४९ ॥

अम्लाध्युषितरोगकी शान्तिके लिये शीतल औषधियोंका प्रलेप करे । इसमें तन्दुकघृत, त्रिफलाघृत किंवा एकमात्र पुराना घृत पान करना हितकारी है । इसमें शिरावेध न कर पित्तज अभिष्यन्दनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४९ ॥

चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । ११८५

सर्पिः क्षौद्राञ्जनं च स्याच्छिरोत्पातस्य भेषजम् ।
तद्वत्सैन्धवकासीसं स्तन्यपिष्टं च पूजितम् ॥ ५० ॥
शिरोत्पातरोगमें घृत और मधुके साथ मर्दनकर सौवीराञ्जन एवं स्त्रीके दूधमें सैन्धेनमक और हीराकसीसको पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे शिरोत्पात रोगका नाश होता है ॥ ५० ॥

शिराहर्षेऽञ्जनं कुर्यात्फाणितं मधुसंयुतम् ।
मधुना तार्क्ष्यशैलं वा कासीसं वा समाक्षिकम् ॥ ५१ ॥
व्रणशुक्रप्रशान्त्यर्थं षडङ्गं गुग्गुलुं पिबेत् ।
कतकस्य फलं शङ्खं तिन्दुकं रूपमेव च ॥
कांस्ये निघृष्टं स्तन्येन क्षतशुकार्त्तिरोगजित् ॥ ५२ ॥
शिराहर्षरोगमें राव और शहदका अञ्जन बनाकर नेत्रोंमें लगावे । अथवा रसौतको शहदके साथ किंवा हीराकसीसको शहदके साथ मिलाकर आँखोंमें आँजे व्रण और शुक्ररोगकी शान्तिके लिये षडङ्गगुग्गुलुको पान करे । निर्मलीके फल, शङ्खचूर्ण, तेन्दु और चाँदी इनको समान भाग लेकर काँसीके पात्रमें स्त्रीके दूधके साथ खरलकर नेत्रोंमें लेप करनेसे नेत्रव्रण, शुक्र, लाली, पीडा दूर होय ॥

शिरया वा हरेद्रक्तं जलौकाभिश्च लोचनात् ।
अक्षमज्जाञ्जनं सायं स्तन्येन शुक्रनाशनम् ॥ ५३ ॥
शुक्ररोगमें नेत्रोंकी शिरामेंसे जोंक लगवाकर रक्त निकलवावे । फिर बहेडेकी गिरीको नारीके दूधके साथ पीसकर और शहद मिलाकर सन्ध्यासमय आँखोंमें लगावे । इससे शुक्ररोग नष्ट होता है ॥ ५३ ॥

एकं वा पुण्डरीकं च छागीक्षीरावसेचितम् ।
रागाश्रुवेदनां हन्यात् क्षतपाकात्ययाजकाः ।
तुत्थकं वारिणा युक्तं शुक्रं हन्त्याक्षिपूरणात् ॥ ५४ ॥
केवल एकमात्र पुण्डेरियाको पीसकर वस्त्रमें बाँधकर पोटली बनालेवे, उस पोटलीको बकरीके दूधमें डुबोकर रखदेवे । जब दूध पीला होजाय तब उससे नेत्रोंकों सिञ्चन करे । यह प्रयोग नेत्रोंकी लाली, अश्रुपात, वेदना क्षत एवं पाकादिकों निवारण करता है । तूतियाको जलमें घिसकर आँखोंमें पूरनेसे शुकरोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥

७५

११८६भैषज्यरत्नावली ।[ नेत्ररोग-

समुद्रफेनदक्षाण्डत्वक्सिन्धूत्थैः समाक्षिकैः ।
शिग्रुबीजयुतैर्वर्त्तिः शुक्रघ्नी शिग्रुवारिणा ॥ ५५ ॥
समुद्रफेनका चूर्ण, मुर्गीके अण्डेका छिलका, सैंधानमक और सहिंजनेके बीज इन सबको शहद और सहिंजनेके रसमें खरल करके बत्ती बनालेवे । यह बत्ती नेत्रोंमें लगानेसे शुक्ररोगको नष्ट करती है ॥ ५५ ॥

धात्रीफलं निम्बकपित्थपत्रं यष्ट्याह्नलोध्रं खदिरं
तिलाश्च । क्वाथः सुशीतो नयने निषिक्तं सर्वप्रकारं
विनिहन्ति शुक्रम् ॥ ५६ ॥
आमले, नीमके पत्ते, कैथके पत्ते, मुलहठी, लोध, खैर और तिल इनके शीतल क्वाथके द्वारा नेत्रोंमें छीटे लगानेसे यह क्वाथ सर्वप्रकारके शुक्ररोगको नष्टकरताहै॥

क्षुण्णपुन्नागपत्रेण परिभावितवारिणा ।
श्यामाक्वाथाम्बुना वाथ सेचनं कुसुमापहम् ॥ ५७ ॥
नागकेशरके पत्तोंको कुचलकर भावना देकर निकालेहुए रससे अथवा श्यामल-ताके क्वाथसे नेत्रोंको सिञ्चन करनेसे कुसुमनामक नेत्ररोग दूरहोताहै ॥

दक्षाण्डत्वक्शिलाशङ्खकाच चन्दनगैरिकैः ।
तुल्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्म्मादिविलेखनः ॥ ५८ ॥
मुर्गीके अण्डेका छिलका, मैनसिल, शंखचूर्ण, कांच, लालचन्दन और गेरू इनको एकत्र पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे यह योग कुसुम और अर्मादि रोगको विनाश करता है ॥ ५८ ॥

शिरीषबीजमरिचपिप्पलीसन्धवैरपि ।
शुक्रे प्रघर्षणं कार्यमथवा सैन्धवेन च ॥ ५९ ॥
सिरसके बीज, कालीमिरच, पीपल और सैंधानमक इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहदमें खरल करके सलाईसे नेत्रोंमें लगावे अथवा सैंधेनमकसे घर्षण करे तो शुक्र (फूली) रोग नष्ट होता है ॥ ५९ ॥

बहुशः पलाशकुसुमस्वरसैः परिभाविता जयत्यचिरात् ।
नक्ताह्वबीजवर्त्तिः कुसुमचयं दृक्षु चिरजमपि ॥ ६० ॥
करञ्जके बीजोंके चूर्णको ढाकके फूलोंके स्वरससे सात दिनतक भावना देकर बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें लगानेसे बहुत पुराना कुसुमरोगभी तत्काल नष्ट होता है ॥ ६० ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८७

सैन्धवत्रिफलाकृष्णाकटुका शङ्खनाभयः ।
सताम्ररजसो वर्त्तिः पिष्टा शुक्रविनाशिनी ॥ ६१ ॥
सैंधानमक, त्रिफला, पीपल, कुटकी, शंखनाभि, ताँवेकी भस्म इन सबकों शहदमें घोटकर बत्ती बनालेवे। फिर उसके द्वारा अंजन लगावे तो नेत्र शुक्र दूर होय ॥

चन्दनं सैन्धवं पथ्या पलाशतरुशोणितम् ।
क्रमवृद्धमिदं चूर्णं शुक्रार्मादिविलेखनम् ॥ ६२ ॥
लालचन्दन, सैंधानमक, हरड और ढाकका गोंद इन सबको क्रमशः बढाता हुआ लेवे । फिर सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके शहदमें मिलाकर सलाईसे लगावे तो नेत्रोंका शुक्र और अर्मादिरोग नाश होता है ॥ ६२ ॥

शङ्खस्य भागाश्चत्वारस्ततोऽर्धेन मनःशिला ।
मनःशिलार्द्धं मरिचं मरिचार्द्धेन सैन्धवम् ॥
एतच्चूर्णाञ्जनं श्रेष्ठं शुक्रार्मातिमिरेषु च ॥ ६३ ॥
शंखनाभि ४ भाग, मैनसिल २ भाग, कालीमिरच १ भाग और सैंधानमक आधाभाग इन सबके चूर्णको शहदमें मिलाकर सलाईके द्वारा नेत्रोंके शुक्र, अर्म और तिमिर रोगमें आँजना श्रेष्ठ है ॥ ६३ ॥

ताप्यंमधुकसारो वा बीजमक्षस्य सैन्धवम् ।
मधुनाऽञ्जनयोगाः स्युश्चत्वारः शुक्रशान्तये ॥ ६४ ॥
सोनामाखी, मुहलठीका सत्त, बहेडेकी गुठलीकी मींग और सैंधानमक इन चारोंमेंसे किसी एकको शहदमें मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे शुक्ररोग शमन होता है। ये चारों ही योग शुक्ररोग नाशक हैं ॥ ६४ ॥

वटक्षीरेण संयुक्तं श्लक्ष्णं कर्पूरजं रजः
क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति शुक्रं चापि घनोन्नतम् ॥६५॥
कर्पूरको खूब बारीक पीसकर बडके दूधमें मिश्रित करके आँखोंमें आँजनेसे अत्यन्त घन और उन्नत शुक्ररोगभी तत्काल नष्ट होता है ॥ ६५ ॥

तालस्य नारिकेलस्य तथैवारुष्करस्य च ।
करीषस्य च वंशानां कृत्वा क्षारं परिस्रुतम् ॥ ६६ ॥
करभास्थिकृतं चूर्णं क्षारेण परिभावितम् ।
सप्तकृत्वोऽष्टकृत्वो वा श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत ॥ ६७ ॥

११८८भेषज्यरत्नावली[ नेत्ररोग-

एतच्छुक्रेष्वसाध्येषु कृष्णीकरणमुत्तमम् ।
यानि शुक्राणि साध्यानि तेषां परममञ्जनम् ॥ ६८ ॥
ताड़की जटा, नारियलकी गिरी, भिलावे और बाँसके अंकुर इन सबको तिलनालकी अग्निके द्वारा पृथक् पृथक् भस्मकर सबका क्षार ग्रहण करे । फिर उस क्षारको आठगुने जलमें पकावे । जब चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उसको २१ बार छाने, उस जलमें ऊँटकी हड्डीका चूर्ण डालकर सात अथवा आठ दिनतक खरल करे । जब अच्छे प्रकार घुटकर बारीक होजाय तब सुखाकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उसको शहदमें मिलाकर सलाईसे आँखोंमें लगावे तो यह असाध्य शुक्ररोगमें फूलीको दूरकर तत्काल कृष्णताको उत्पन्न करता है और साध्यशुक्रको नष्ट करनेके लिये तो यह परमोत्तम अञ्जन है ॥ ६६–६८ ॥

अजकां पार्श्वतो विद्ध्वा सूच्या विस्राव्य चोदकम् ।
व्रणं गोमयचूर्णेन पूरयेत्सर्पिषा सह ॥ ६९ ॥
अजका नामक नेत्ररोगमें नेत्रके समीपकी शिराको सुईसे बेधकर जल निकाले उस व्रणको उपलोंके चूर्णके साथ घृत मिलाकर लगानेसे नेत्रव्रण शीघ्र भरजाता है ॥ ६९ ॥

सैन्धवं वाजिपादं च गोरोचनसमन्वितम् ।
शेलुत्वग्रससंयुक्तं पूरणं चाजकापहम् ॥ ७० ॥
सैंधानमक, घोडेकी खुर और गोरोचन इनको समान भाग लेकर लसौडेकी छालके रसमें मिलाकर आँखोंमें भरनेसे अजकारोग दूर होता है ॥ ७० ॥

लिह्यात्सदा वा त्रिफलां सुचूर्णितां घृतप्रगाढां तिमिरेऽथ पित्तजे ।
समीरजे तैलयुतां कफात्मके मधुप्रगाढां विदधीत युक्तितः ॥ ७१ ॥
पित्तजतिमिररोगमें त्रिफलेके चूर्णको घृतके साथ, वातजतिमिरमें तेलके साथ और कफजतिमिररोगमें मधुके साथ मिलाकर युक्तिपूर्वक भक्षण करे ॥ ७१ ॥

कल्कः क्वाथोऽथवा चूर्णं त्रिफलाया निषेवितम् ।
मधुना सर्पिषा वापि समस्ततिमिरापहम् ॥ ७२ ॥
त्रिफलेका कल्क, क्वाथ अथवा चूर्ण, मधु और घृतके साथ मिश्रितकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके तिमिररोग नष्ट होते हैं ॥ ७२ ॥

यस्त्रैफलं चूर्णमपथ्यवर्जी सायं समश्नाति हविर्मधुभ्याम् ।
स मुच्यते नेत्रगतैर्विकारैर्भृत्यैर्यथा क्षीणधनो मनुष्यः ॥ ७३ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८९

जो पुरुष पथ्यद्रव्योंका भोजन करता हुआ प्रतिदिन सन्ध्यासमय त्रिफलेके चूर्णको घृत और मधुके साथ मिलाकर भक्षण करे तो वह मनुष्य सम्पूर्ण नेत्र रोगोंसे इस प्रकार मुक्त होता है, जैसे धनहीन मनुष्य सेवकोंसे छूटजाता है ॥ ७३ ॥

सघृतं वा वराक्वाथं शीलयेत्तिमिरमयी ॥ तिमिररोगी निरन्तर घृत डालकर त्रिफलेके क्वाथको पान करे ॥

त्रिफलायाः कषायेण प्रातर्नयनधावनात् । जाता रोगा विनश्यन्ति न भवन्ति कदाचन ॥ ७४ ॥ प्रतिदिन प्रातःकालमें त्रिफलेके क्वाथसे नेत्रोंको धोनेसे उत्पन्नहुए नेत्ररोग नष्ट होजाते हैं और फिर नेत्ररोग कभी पैदा नहीं होते हैं ॥ ७४ ॥

जलगण्डूषैः प्रातर्बहुशोऽम्भोभिः प्रपूर्य मुखरन्ध्रम् । निर्दयमुक्षन्नक्षि क्षपयति तिमिराणि ना सद्यः ॥ ७५ ॥ प्रातः समय बहुतसे शीतल जलको मुखमें भरकर उस जलके द्वारा निर्दयी बनकर जोर जोरसे रोगीके नेत्रोंपर कुल्ले करे इस प्रकार करनेसे तिमिररोग बहुत जल्द नष्ट होता है ॥ ७५ ॥

भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि । अचिरेणैव तद्वारि तिमिराणि व्यपोहति ॥ ७६ ॥ भोजन करनेके बाद हाथकी हथेलीको जलसे घिसकर नेत्रोंमें बारम्बार लगावे तो शीघ्रही वह जल तिमिररोगको नष्ट करता है ॥ ७६ ॥

पत्रगैरिककर्पूरयष्टीनीलोत्पलाञ्जनम् । नागकेशरसंयुक्तमशेषतिमिरापहम् ॥ ७७ ॥ तेजपात, गेरू, कपूर, मुलहठी, नील कमल, रसौत और नागकेशर इनको समान भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर आँखोंमें आँजनेसे समस्त तिमिररोग नष्ट होते हैं ॥

शंखस्य भागाश्चत्वारस्तदर्द्धेन मनः शिला । मनःशिलाद्धैं मरिचं मरिचार्द्धेन पिप्पली ॥ ७८ ॥ वारिणा तिमिरं हन्ति अर्बुदं हन्ति मस्तुना । पिच्चिटं मधुना हन्ति स्त्रीक्षीरेण तदुत्तमम् ॥ ७९ ॥ शंख चार भाग, मैनासिल दो भाग, मिरच एक भाग और सेंधानमक आधा भाग इनको एकत्र कूट पीस छानकर अञ्जन बनालेवे । इस अञ्जनको जलके साथ मिलाकर लगानेसे तिमिररोग, दहीके तोडके साथ लगानेसे अर्बुदरोग, शहदमें

११९० | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग-

मिलाकर लगानेसे पिच्चिटरोग और स्त्रीके दूधमें मिलाकर लगानेसे सर्व प्रकारके नेत्ररोग नष्ट होते हैं ॥ ७८ ॥ ७९ ॥

हरिद्रानिम्बपत्राणि पिप्पली मरिचानि च ।
भद्रमुस्तं विडङ्गानि ससमं विश्वभेषजम् ॥ ८० ॥
गोमूत्रेण गुडी कार्या छागमूत्रेण चाञ्जनात् ।
ज्वरांश्च निखिलान्हन्ति भूतावेशं तथैव च ॥ ८१ ॥
वारिणा तिमिरं हन्ति मधुना पटलं तथा
नक्तान्ध्यं भृङ्गराजेन नारीक्षीरेण पुष्पकम् ॥
शिशिरेण परिस्रावमध्रुषं पिच्चिटं तथा ॥ ८२ ॥

हल्दी, नीमके पत्ते, पीपल, मिरच, नागरमोथा, वायविडङ्ग और सोंठ इनको समान भाग लेकर एकत्र गोमूत्रके साथ उत्तम प्रकार खरल करके गोली बनालेवे । इस गोलीको बकरीके मूत्रमें घिसकर लगानेसे सर्व प्रकारके आगन्तुक ज्वर और भूतावेश तथा जलके साथ लगानेसे तिमिररोग, मधुके साथ लगानेसे पटलरोग, भाँगरेके स्वरसके साथ लगानेसे रतौंधा, स्त्रीके दूधके साथ लगानेसे पुष्पकरोग और शीतलजलके साथ मिलाकर लगानेसे परिस्राव, अध्रुष और पिच्चिटरोग नष्ट होते हैं ॥ ८०–८२ ॥

भूमौनिघृष्टयाऽङ्गुल्या अञ्जनं शमनं तयोः ।
तैमिर्यकाचार्महरं धूमिकायाश्च नाशनम् ॥८३॥

पृथ्वीमें अंगुलीको घिसकर फिर अञ्जन लगानेसे तिमिर, काच, अर्म और धूमिकारोगका नाश होता है ॥ ८३ ॥

त्रिफलाभृङ्गमहौषधमध्वाज्यच्छागपयसि गोमूत्रे ।
नागं सप्तनिषिक्तं करोति गरुडोपमं चक्षुः ॥ ८४ ॥

सीसेको अग्निमें तपाकर त्रिफलेके क्वाथ, भाँगरेके स्वरस, सोंठके क्वाथ, शहद, घी, बकरीके दूध और गोमूत्र इनमें क्रमपूर्वक सातवार बुझाकर उसकी सलाई बनालेवे । फिर उस सलाईको पत्थरपर घिसकर अञ्जन लगावे तो इससे गरुडके समान दृष्टिशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म होजाती है ॥ ८४ ॥

चिञ्चापत्ररसं निधाय विमले त्वौडुम्बरे भाजने
मलं तत्र निघृष्टसैन्धवयुतं गौअं विशोष्यातपे ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९१


तच्चूर्णं विमलाञ्जनेन सहितं नेत्राञ्जने शस्यते
काचार्मार्जुनपिच्चिटे सतिमिरे स्रावं च निर्वापयेत् ॥८५॥
इमलीके पत्तोंके स्वरसको ताँबेके पात्रमें (या गूलरकी लकडीके बने पात्रमें) रखकर उसमें पोहकर मूल और सैंधानमक डालकर खरल करे। फिर धूपमें सुखाकर बारीक चूर्ण करलेवे। उस चूर्णको काले सुरमेके साथ मिलाकर सलाईसे आँखोंमें आँजे तो इससे काच, अर्म, अर्जुन, पिच्चिट और तिमिररोग एवं नेत्रोंमेंसे जलका गिरना नष्ट होजाता है ॥ ८५ ॥

चित्राषष्ठीयोगे सैन्धवममलं विचूर्ण्य तेनाक्षि ।
सममञ्जनेन तिमिरं गच्छति वर्षादसाध्यमपि ॥ ८६ ॥
चित्रानक्षत्रयुक्त षष्ठी (छठ) तिथिमें सैंधेनमकको बारीक पीसकर आँखोंमें आँजनेसे एक वर्षका पुराना असाध्य तिमिररोगभी नष्ट होता है ॥ ८६ ॥

दद्यादुशीरनिर्य्यूहे चूर्णितं कणसैन्धवम् ।
तत्स्रुतं सघृतं तत्र भूयः क्षौद्रं क्षिपेद्घने ॥
शीते चास्मिन् हितमिदं सर्वजे तिमिरेऽञ्जनम् ॥ ८७ ॥
खसके क्वाथमें पीपलका चूर्ण, सैंधानमकका चूर्ण और घृत डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें शहद मिलालेवे। फिर इसको नेत्रोंमें लगावे । यह अञ्जन सर्व प्रकारके तिमिररोगोंमें हितकारी है ॥ ८७ ॥

धात्रीरसाञ्जनक्षौद्रसर्पिर्भिस्तु रसक्रिया ।
पित्तानिलाक्षिरोगघ्नीतैमिर्यपटलापहा ॥ ८८ ॥
आमलेका क्वाथ, रसौत, शहद और घृत इनको एकत्र यथाविधि पकाकर नेत्रोंमें डालनेसे पित्तज, वातज चक्षुरोग एवं तिमिर और पटल नष्ट होता है ॥

शृङ्गवेरं भृङ्गराजं यष्टीतैलेन मिश्रितम् ।
नस्यमेतेन दातव्यं महापटलनाशनम् ॥ ८९ ॥
अदरख, भाङ्गरा इनके रसको और मुलहठीके चूर्णको तिलके तेलमें मिलाकर सूँघनेसे महापटल रोगका नाश होता है ॥ ८९ ॥

लिङ्गनाशे कफोद्भूते यथावद्विधिपूर्वकम् ।
विद्धा दैवकृते छिद्रे नेत्रं स्तन्येन पूरयेत् ॥ ९० ॥

११९२भैषज्यरत्नावली ।[ क्षुद्ररोग-

ततो दृष्टेषु रूपेषु शलाकामाहरेच्छनैः ।
नयनं सर्पिषाऽभ्यज्य वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् ॥ ९१ ॥
ततो गृहे निराबाधे शयीतोत्तान एव च ।
उद्गारकासक्षवथुष्ठीवनोत्कम्पनानि च ॥
तत्कालं नाचरेदूर्ध्वं यन्त्रणा स्नेहपीतवत् ॥ ९२ ॥

कफसे उत्पन्न हुए लिङ्गनाश (दृष्टिनाशक) रोगमें विधिपूर्वक स्वभावजन्य छिद्र-को ताँबेकी सलाईसे वेधकर नेत्रोंको स्त्रीके दूधसे भरदेवे। जब कुछ स्वरूप दीखने लगे तब सलाईको धीरे धीरे निकाललेवे और नेत्रोंको घीसे चुपड़कर कपड़ेकी पट्टी से बाँधदेवे। रोगीको धूप, धुआँ और वायुसे रहित स्थानमें चित्त लिटाकर सुला-देवे। एक सप्ताह पर्यन्त रोगीको उद्गार (डकार), खाँसी, छींक, थूकना और कम्प न हो इस विषयमें विशेष लक्ष्य रखना चाहिये और स्नेहपान करनेवालेकी समान पथ्यादिका प्रयोग करना चाहिये ॥ ९०-९२ ॥

त्र्यहात्त्र्यहाद्धारयेत्तत् कषायैरनिलापहैः ॥ ९३ ॥
वायोर्भयात् त्र्यहादूर्ध्वं स्नेहयेदक्षि पूर्ववत् ।
दशरात्रं तु संयम्य हितं दृष्टिप्रसादनम् ॥ ९४ ॥
पश्चात्कर्म च सेवेत लङ्घनं चापि मात्रया ।
रागश्वोषोऽर्बुदं शोथो बुद्बुदं केकराक्षता ॥ ९५ ॥
अधिमन्थादयश्चान्ये रोगाः स्युर्दुष्टवेधजाः ।
अहिताचारतो वापि यथास्वं तानुपाचरेत् ॥ ९६ ॥

फिर तीन तीन दिनके पश्चात् नेत्रोंके बन्धनको खोलकर वातनाशक औषधियोंके क्वाथसे नेत्रोंको धोवे और वायु लगनेके भयसे तीसरे दिन घृतसे नेत्रोंको चुपड़कर पूर्ववत् बाँधदेवे। इस प्रकार करते करते जब दश दिन बीत जायँ तब दृष्टिप्रसन्नता-कारक क्रिया करे और हल्के अन्नको मात्रानुसार देवे। यदि नेत्रोंको कुविधिसे वेधनेसे अथवा रोगीके अहित आचरण करनेसे नेत्रोंमें लाली, चोष, अर्बुद, सूजन, बुद्बुद, केकड़ेकी समान नेत्रोंका होना और अधिमन्थादि दुष्ट रोग उत्पन्न होजायँ तब विधिपूर्वक चिकित्सा कर उनको दूर करे ॥ ९३-९६ ॥

रुजायामक्षिरोगे वा भूयो योगान्निबोध मे ।
कलिकताः सघृता दूर्वायवगैरिकशारिवाः ॥
सुखालेपाः प्रयोक्तव्या रुजारागोपशान्तये ॥ ९७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । [ ११९३

नेत्ररोगमें उक्त पीडा होनेपर क्या करना चाहिये इसको कहते हैं:-दूब, जौ, गेरू और अनन्तमूल इनको समान भाग लेकर घृतमें पीसकर नेत्रोंपर लेप करे तो नेत्रोंकी पीडा और लाली दूर होती है ॥ ९७ ॥

पयस्याशारिवापत्रमञ्जिष्ठामधुकैरपि ।
अजाक्षीरान्वितैर्लेपः सुखोष्णः पथ्य उच्यते ॥ ९८ ॥

क्षीरकाकोली, अनन्तमूल, तेजपात, मंजीठ और मुलहठी इनको समानांश लेकर बकरीके दूधमें खरल करके अग्निपर कुछ एक गरम कर नेत्रोंपर सुहाता २ लेप करें तो शीघ्र आराम होता है ॥ ९८ ॥

वातघ्नसिद्धे पयसि सिद्धं सर्पिश्चतुर्गुणे ।
काकोल्यादिप्रतीवापं तद्युञ्ज्यात्सर्वकर्मसु ॥ ९९ ॥

भद्रदार्वादिगणोक्त औषधियोंके द्वारा सिद्ध किया हुआ दूध चार सेर और काकोल्यादिगणकी औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित सोलह तोला तथा घृत एक सेर लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे इस घृतको नस्य, पान और अभ्यंजनादि सर्व कर्मोंमें प्रयोग करना चाहिये ९९

शाम्यत्येवं न चेच्छूलं स्निग्धस्विन्नस्य मोक्षयेत् ।
ततः शिरां दहेच्चापि मतिमान् कीर्त्तितं यथा ॥ १०० ॥

यदि उपर्युक्त क्रियासेभी नेत्रोंका शूल न शान्त हो तो स्निग्धस्वेद देकर रोगीकें ललाटकी शिराका वेधकर रक्तमोक्षण करे और उस स्थानको दग्ध करदेवे १००

दृष्टेरथ प्रसादार्थमञ्जनं शृणु मे शुभे ।
मेषशृङ्गस्य पत्राणि शिरीषधवयोरपि ॥ १ ॥
मालत्याश्चापि तुल्यानि मुक्तां वैदूर्यमेव च ।
अजाक्षीरेण संपिष्य ताम्रे सप्ताहमावपेत् ॥
प्रणिधाय तु तद्वर्त्ति योजयेदञ्जने भिषक् ॥ २ ॥

अब मैं दृष्टिकी प्रसन्नताके लिये अञ्जन कहता हूँ उसको सुनो । मेढासिङ्गी, सिरस, धव और चमेली इन सबके फूल, मोती और वेडूर्यमणि, इन सबोंको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर ताँबेके बर्त्तनमें सात दिनतक रक्खे, फिर उसकी बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें आँजनेसे नेत्रगत सर्व प्रकारकी पीडा नष्ट होती है ॥ १०१-२ ॥

११९४ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

स्रोतोर्जं विद्रुमं फेनं सागरस्य मनःशिला । मरिचानि च तां वर्तिं कारयेद्धापि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ रसौत, मूँगा, समुद्रफेन, मैनसिल और काली मिरच इनको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर और ताँबेके पात्रमें सात दिनतक रखकर बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंकी सब पीडा शान्त होती है ॥ ३ ॥

रसाञ्जनं घृतं क्षौद्रं तालीशं स्वर्णगैरिकम् । गोशकृद्रससंयुक्तं पित्तोपहतदृष्टये ॥ ४ ॥ रसौत, घी, तालीसपत्र, शहद और पीलागेरू ये सब समान भाग लेकर गौकें गोबरके रसमें खरल करले, फिर उसकी बत्ती बनाकर पित्तजदृष्टि दोषको शमन करनेके लिये नेत्रोंमें लगावे ॥ ४ ॥

नलिनोत्पलकिञ्जल्कं गोशकृद्रससंयुक्तम् । गुडिकाञ्जनमेतत्स्याद्दिनरात्र्यन्धयोर्हितम् ॥ ५ ॥ कमलकेशर और नीलोत्पलकी केशर इनको गौके गोबरके रसमें घोटकर गोली बनालेवे । उस गोलीको घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे दिनकी और रात्रिकी अन्धता नष्ट होजाती है ॥ ५ ॥

नदीजशंखत्रिकटून्यथाञ्जनं मनःशिला द्वे च निशे गवां यकृत् । सचन्दनेयं गुडिकेक्षणाऽञ्जने प्रशस्यते रात्रिदिनेष्वपश्यताम् ॥ ६ ॥ सैंधानमक, शंखनाभि, सोंठ, मिरच, पीपल, रसौत, मैनसिल, हल्दी, दारुहल्दी, गोरोचन और लालचन्दन इनको समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बनावे । उस गोलीको नेत्रोंमें आँजनेसे दिन और रात्रि दोनोंकी अन्धता दूर होकर अच्छे प्रकार दीखने लगता है ॥ ६ ॥

कणा छागयकृन्मध्ये पक्का तद्रसपेषिता । अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत्सक्षौद्रमूषणम् ॥ ७ ॥ पीपलको, बकरीके यकृत् (जिगर) में पकाकर और उसीके रसमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे अथवा उक्त प्रकारसे कालीमिरचको पकाकर और शहदमें मिला-कर नेत्रोंमें आँजनेसे रात्र्यन्धता (रतौंधा) तत्काल नष्ट होती है ॥ ७ ॥

पचेत्तु गोधां हि यकृत्प्रकल्पितं प्रपूरितं मागधिकाभिरग्निन । निषेवितं तद् यकृदञ्जनेन च निहन्ति नक्तान्ध्यमसंशयं खलु८

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९५

गोहके यकृत ( पिल्ली ) को पीपलके चूर्णसे भरकर जलमें मन्दमन्द अग्निद्वारा पकाकर भक्षणकरे अथवा उसी पकायेहुए जलमें उसको घिसकर नेत्रोंमें लगावे तो नक्तान्ध्य ( रतौंधा ) निश्चय दूर होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥

दध्ना निघृष्टं मरिचं रात्र्यन्धाञ्जनमुत्तमम् ॥
दहीके साथ काली मिरचोंको घिसकर नेत्रोंमें आँजना रतौंधीकी अत्युत्तम है ॥
ताम्बूलयुक्तखद्योतभक्षणं च तदर्थकृत् ॥ ९ ॥
पानके रसमें पटबीजनेको घिसकर भक्षण करनेसे भी रात्र्यन्धता दूरहोती है ॥
शफरीमत्स्यक्षारो नक्तान्ध्यमञ्जनाद्विनिहन्ति ॥
शफरीमत्स्य ( एक प्रकारकी मछली ) को अन्तर्धूमकी रीतिसे दग्धकर उसके क्षारको शहदमें मिलाकर आँजनेसे रतौंधी नष्ट होती है ॥
तद्वद्रामठटङ्गणकर्णमलं चैकशोऽञ्जानन्मधुना ॥ १० ॥
हींग, सुहागेकी खील और कानका मैल इनको एकत्र शहदके साथ खरलकर नेत्रोंमें आँजनेसे रात्र्यन्धताका नाश होता है ॥ ११० ॥
केशराजान्वितं सिद्धं मत्स्याण्डं हन्ति भक्षितम् ।
नक्तान्ध्यं नियतं नृणां सप्ताहात्पथ्यसेविनाम् ॥ ११ ॥
पथ्यद्रव्योंका सेवन करनेवाले मनुष्योंकी नक्तान्धता ( रतौंधी ) रोहितमछलीके अण्डेको भाँगरेके रसमें पकाकर सातदिन सेवन करनेसे नष्ट होती है ॥
घृतं हितं केवलमेव पैत्तिके तथा च तैलं पवनासृगुत्थयोः ॥
पित्तज तिमिररोगमें एकमात्र घृतका नस्य और वातज तथा रक्तज तिमिर रोगमें तेलका नस्य देना हितकर है ॥ १२ ॥
अर्मं तु च्छेदनीयं स्यात्कृष्णप्राप्तं भवेद्यथा ।
बडिशविद्धमुन्नम्य त्रिभागं चात्र वर्जयेत् ॥ १३ ॥
यदि अर्मनामक चक्षुरोग बढकर नेत्रके कृष्णभागमें पहुँच गया हो तो त्रिभाग अर्थात् कनीनिकाको त्यागकर सुईसे उसको ऊँचाकर बडिशयन्त्रसे वेध देवे, और मण्डलके अग्रभागको अस्त्रसे छेदन करे ॥ १३ ॥
पिप्पलीत्रिफलालाक्षालौहचूर्णं ससैन्धवम् ।
भृङ्गराजरसे पिष्टं गुडिकाञ्जनमिष्यते ॥ १४ ॥
पीपल, हरड, बहेडा, आमला, लाख, लोहचूर्ण और सैंधानमक इनकों समान भाग लेकर भाँगरेके रसमें खरल करके गोली बनालेवे ॥ १४ ॥

११९६ भैषज्यरत्नावली । [नेत्ररोग-


अर्मं सतिमिरं काचं कण्डूं शुक्रं तथाऽर्जुनम् ।
अजकां नेत्ररोगांश्च हन्यान्निरवशेषतः ॥ १५ ॥
यह गोली घिसकर आँखोंमें लगानेसे अर्म, तिमिर, काच, खुजली, शुक्र, अर्जुन, अजका और अन्यान्य सम्पूर्ण नेत्रविकारोंको समूल नष्ट करदेती है ॥ १५ ॥

पुष्पारुयाताक्ष्यर्जसितोदधिफेनशङ्खसिन्धूत्थगैरिकशिला-
मरिचैः समांशैः । पिष्टैश्च माक्षीकरसेन रसक्रियेयं हन्त्य-
र्मकाचतिमिरार्जुनवर्त्मरोगान् ॥ १६ ॥
पुष्पकसीस, रसौत, मिश्री, समुद्रफेन, शंखनाभि, सेंधानमक, गेरू, मैनसिल और मिरच सबको समान भाग लेकर शहदके साथ खरल करके नेत्रोंमें आँजनेसे अर्म, काच, तिमिर, अर्जुन और वर्त्मादिनेत्ररोग दूर होते हैं ॥ १६ ॥

कौम्भस्य सर्पिषः पानैर्विरेकालेपसेचनैः ।
स्वादुशीतैः प्रशमयेच्छुक्तिकामञ्जनैस्ततः ॥ १७ ॥
शुक्तिकानामक नेत्ररोगको दस वर्षका पुराना घृत पानकर तथा विरेचन, प्रलेप, सेचन और मधुर तथा शीतल द्रव्योंके अञ्जनका प्रयोग इत्यादि क्रियाओंका उपयोग करके शमन करे ॥ १७ ॥

प्रवालमुक्तावैदूर्यशङ्खस्फटिकचन्दनम् ।
सुवर्णरजतक्षौद्रमंजनं शुक्तिकापहम् ॥ १८ ॥
मूँगा, मोती, वैदूर्यमणि, शंखनाभि, स्फटिकमणि, लालचन्दन, सोना और चाँदी इनको समान भाग लेकर शहदमें खरल करके अञ्जन बनालेवे । यह अंजन नियमपूर्वक लगानेसे शुक्तिकारोगको नष्ट करता है ॥ १८ ॥

शंखः क्षौद्रेण संयुक्तः कतकः सैन्धवेन च ।
सितयाऽर्णवफेनो वा पृथगञ्जनमर्जुने ॥ १९ ॥
शंखनाभिकी भस्मको शहदमें मिलाकर अथवा निर्मलीके चूर्णको सेंधेनमकके साथ किंवा समुद्रफेनके चूर्णको मिश्रीके साथ मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे अर्जुन-नामक नेत्ररोगमें लाभ होता है ॥ १९ ॥

पैत्तं विधिमशेषेण कुर्यादर्जुनशान्तये ।
अर्जुनरोगको नष्ट करनेके लिये पित्तनाशक सम्पूर्ण क्रियाकरे ॥

वैदेही श्वेतमरिचं सैन्धवं नागरं समम् ।
मातुलुङ्गरसैः पिष्टमंजनं पिष्टकापहम् ॥ १२० ॥