भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1228

११९६ भैषज्यरत्नावली । [नेत्ररोग-


अर्मं सतिमिरं काचं कण्डूं शुक्रं तथाऽर्जुनम् ।
अजकां नेत्ररोगांश्च हन्यान्निरवशेषतः ॥ १५ ॥
यह गोली घिसकर आँखोंमें लगानेसे अर्म, तिमिर, काच, खुजली, शुक्र, अर्जुन, अजका और अन्यान्य सम्पूर्ण नेत्रविकारोंको समूल नष्ट करदेती है ॥ १५ ॥

पुष्पारुयाताक्ष्यर्जसितोदधिफेनशङ्खसिन्धूत्थगैरिकशिला-
मरिचैः समांशैः । पिष्टैश्च माक्षीकरसेन रसक्रियेयं हन्त्य-
र्मकाचतिमिरार्जुनवर्त्मरोगान् ॥ १६ ॥
पुष्पकसीस, रसौत, मिश्री, समुद्रफेन, शंखनाभि, सेंधानमक, गेरू, मैनसिल और मिरच सबको समान भाग लेकर शहदके साथ खरल करके नेत्रोंमें आँजनेसे अर्म, काच, तिमिर, अर्जुन और वर्त्मादिनेत्ररोग दूर होते हैं ॥ १६ ॥

कौम्भस्य सर्पिषः पानैर्विरेकालेपसेचनैः ।
स्वादुशीतैः प्रशमयेच्छुक्तिकामञ्जनैस्ततः ॥ १७ ॥
शुक्तिकानामक नेत्ररोगको दस वर्षका पुराना घृत पानकर तथा विरेचन, प्रलेप, सेचन और मधुर तथा शीतल द्रव्योंके अञ्जनका प्रयोग इत्यादि क्रियाओंका उपयोग करके शमन करे ॥ १७ ॥

प्रवालमुक्तावैदूर्यशङ्खस्फटिकचन्दनम् ।
सुवर्णरजतक्षौद्रमंजनं शुक्तिकापहम् ॥ १८ ॥
मूँगा, मोती, वैदूर्यमणि, शंखनाभि, स्फटिकमणि, लालचन्दन, सोना और चाँदी इनको समान भाग लेकर शहदमें खरल करके अञ्जन बनालेवे । यह अंजन नियमपूर्वक लगानेसे शुक्तिकारोगको नष्ट करता है ॥ १८ ॥

शंखः क्षौद्रेण संयुक्तः कतकः सैन्धवेन च ।
सितयाऽर्णवफेनो वा पृथगञ्जनमर्जुने ॥ १९ ॥
शंखनाभिकी भस्मको शहदमें मिलाकर अथवा निर्मलीके चूर्णको सेंधेनमकके साथ किंवा समुद्रफेनके चूर्णको मिश्रीके साथ मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे अर्जुन-नामक नेत्ररोगमें लाभ होता है ॥ १९ ॥

पैत्तं विधिमशेषेण कुर्यादर्जुनशान्तये ।
अर्जुनरोगको नष्ट करनेके लिये पित्तनाशक सम्पूर्ण क्रियाकरे ॥

वैदेही श्वेतमरिचं सैन्धवं नागरं समम् ।
मातुलुङ्गरसैः पिष्टमंजनं पिष्टकापहम् ॥ १२० ॥