भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९५

गोहके यकृत ( पिल्ली ) को पीपलके चूर्णसे भरकर जलमें मन्दमन्द अग्निद्वारा पकाकर भक्षणकरे अथवा उसी पकायेहुए जलमें उसको घिसकर नेत्रोंमें लगावे तो नक्तान्ध्य ( रतौंधा ) निश्चय दूर होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥

दध्ना निघृष्टं मरिचं रात्र्यन्धाञ्जनमुत्तमम् ॥
दहीके साथ काली मिरचोंको घिसकर नेत्रोंमें आँजना रतौंधीकी अत्युत्तम है ॥
ताम्बूलयुक्तखद्योतभक्षणं च तदर्थकृत् ॥ ९ ॥
पानके रसमें पटबीजनेको घिसकर भक्षण करनेसे भी रात्र्यन्धता दूरहोती है ॥
शफरीमत्स्यक्षारो नक्तान्ध्यमञ्जनाद्विनिहन्ति ॥
शफरीमत्स्य ( एक प्रकारकी मछली ) को अन्तर्धूमकी रीतिसे दग्धकर उसके क्षारको शहदमें मिलाकर आँजनेसे रतौंधी नष्ट होती है ॥
तद्वद्रामठटङ्गणकर्णमलं चैकशोऽञ्जानन्मधुना ॥ १० ॥
हींग, सुहागेकी खील और कानका मैल इनको एकत्र शहदके साथ खरलकर नेत्रोंमें आँजनेसे रात्र्यन्धताका नाश होता है ॥ ११० ॥
केशराजान्वितं सिद्धं मत्स्याण्डं हन्ति भक्षितम् ।
नक्तान्ध्यं नियतं नृणां सप्ताहात्पथ्यसेविनाम् ॥ ११ ॥
पथ्यद्रव्योंका सेवन करनेवाले मनुष्योंकी नक्तान्धता ( रतौंधी ) रोहितमछलीके अण्डेको भाँगरेके रसमें पकाकर सातदिन सेवन करनेसे नष्ट होती है ॥
घृतं हितं केवलमेव पैत्तिके तथा च तैलं पवनासृगुत्थयोः ॥
पित्तज तिमिररोगमें एकमात्र घृतका नस्य और वातज तथा रक्तज तिमिर रोगमें तेलका नस्य देना हितकर है ॥ १२ ॥
अर्मं तु च्छेदनीयं स्यात्कृष्णप्राप्तं भवेद्यथा ।
बडिशविद्धमुन्नम्य त्रिभागं चात्र वर्जयेत् ॥ १३ ॥
यदि अर्मनामक चक्षुरोग बढकर नेत्रके कृष्णभागमें पहुँच गया हो तो त्रिभाग अर्थात् कनीनिकाको त्यागकर सुईसे उसको ऊँचाकर बडिशयन्त्रसे वेध देवे, और मण्डलके अग्रभागको अस्त्रसे छेदन करे ॥ १३ ॥
पिप्पलीत्रिफलालाक्षालौहचूर्णं ससैन्धवम् ।
भृङ्गराजरसे पिष्टं गुडिकाञ्जनमिष्यते ॥ १४ ॥
पीपल, हरड, बहेडा, आमला, लाख, लोहचूर्ण और सैंधानमक इनकों समान भाग लेकर भाँगरेके रसमें खरल करके गोली बनालेवे ॥ १४ ॥