भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1226, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1226

११९४ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

स्रोतोर्जं विद्रुमं फेनं सागरस्य मनःशिला । मरिचानि च तां वर्तिं कारयेद्धापि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ रसौत, मूँगा, समुद्रफेन, मैनसिल और काली मिरच इनको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर और ताँबेके पात्रमें सात दिनतक रखकर बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रोंकी सब पीडा शान्त होती है ॥ ३ ॥

रसाञ्जनं घृतं क्षौद्रं तालीशं स्वर्णगैरिकम् । गोशकृद्रससंयुक्तं पित्तोपहतदृष्टये ॥ ४ ॥ रसौत, घी, तालीसपत्र, शहद और पीलागेरू ये सब समान भाग लेकर गौकें गोबरके रसमें खरल करले, फिर उसकी बत्ती बनाकर पित्तजदृष्टि दोषको शमन करनेके लिये नेत्रोंमें लगावे ॥ ४ ॥

नलिनोत्पलकिञ्जल्कं गोशकृद्रससंयुक्तम् । गुडिकाञ्जनमेतत्स्याद्दिनरात्र्यन्धयोर्हितम् ॥ ५ ॥ कमलकेशर और नीलोत्पलकी केशर इनको गौके गोबरके रसमें घोटकर गोली बनालेवे । उस गोलीको घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे दिनकी और रात्रिकी अन्धता नष्ट होजाती है ॥ ५ ॥

नदीजशंखत्रिकटून्यथाञ्जनं मनःशिला द्वे च निशे गवां यकृत् । सचन्दनेयं गुडिकेक्षणाऽञ्जने प्रशस्यते रात्रिदिनेष्वपश्यताम् ॥ ६ ॥ सैंधानमक, शंखनाभि, सोंठ, मिरच, पीपल, रसौत, मैनसिल, हल्दी, दारुहल्दी, गोरोचन और लालचन्दन इनको समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बनावे । उस गोलीको नेत्रोंमें आँजनेसे दिन और रात्रि दोनोंकी अन्धता दूर होकर अच्छे प्रकार दीखने लगता है ॥ ६ ॥

कणा छागयकृन्मध्ये पक्का तद्रसपेषिता । अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत्सक्षौद्रमूषणम् ॥ ७ ॥ पीपलको, बकरीके यकृत् (जिगर) में पकाकर और उसीके रसमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे अथवा उक्त प्रकारसे कालीमिरचको पकाकर और शहदमें मिला-कर नेत्रोंमें आँजनेसे रात्र्यन्धता (रतौंधा) तत्काल नष्ट होती है ॥ ७ ॥

पचेत्तु गोधां हि यकृत्प्रकल्पितं प्रपूरितं मागधिकाभिरग्निन । निषेवितं तद् यकृदञ्जनेन च निहन्ति नक्तान्ध्यमसंशयं खलु८