भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1229

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९७

पीपल, सहिंजनेके बीज, सेंधानमक और सोंठ इनको बराबर बराबर लेकर बिंजौरे नींबूके रसमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे पिष्टकारोग दूर होता है ॥ १२० ॥

भित्त्वोपनाहं कफजं पिप्पलीमधुसैन्धवैः ।
विलिखेन्मण्डलाग्रेण प्रच्छयेद्वा समन्ततः ॥ २१ ॥

कफजउपनाहरोगको ब्रीहिमुखनामक अस्त्रसे विदीर्ण करके पीपलके चूर्ण शहद और सैंधेनमकको एकत्र पीसकर मण्डलके अग्रभागपर अस्त्रद्वारा लेखन करे फिर चारों ओरसे बाँधदेवे ॥ २१ ॥

पथ्याक्षधात्रीफलमध्यबीजैस्त्रिद्व्येकभागैर्विदधीत वर्त्तिम् ।
तयाऽञ्जयेदक्षुमति प्रगाढमक्षणोर्हरेत्कोपमतिप्रवृद्धम् ॥ २२ ॥

हरडकी गुठलीकी मींग ३ तोले, बहेडेकी मींग २ तोले और आमलोंकी मींग १ तोला लेकर जलमें खरल करके बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको शहदके साथ घिसकर आँखोंमें लगानेसे नेत्रोंके अत्यन्त वृद्धिगत समस्तरोग नष्ट होते हैं ॥ २२ ॥

स्रावेषु त्रिफलाक्वाथं यथादोषं प्रयोजयेत् ।
क्षौद्रेणाज्येन पिप्पल्या मिश्रं विध्याच्छिरां तथा ॥ २३ ॥

पित्तज और रक्तजनित नेत्रोंके स्राव होनेमें त्रिफलेका काढा शहदके साथ, वातज, पित्तज और रक्तजनेत्रस्रावमें उक्त क्वाथ घीके साथ एवं कफज नेत्रस्रावमें पीपलके चूर्णके साथ पान कराना चाहिये । यदि इससेभी स्राव होना बन्द न होतो शिराको वेधना चाहिये ॥ २३ ॥

त्रिफलामूत्रकासीससैन्धवैः सरसाञ्जनैः ।
रसक्रिया कृमिग्रन्थौ भिन्ने स्यात्प्रतिसारणम् ॥ २४ ॥

त्रिफलेका क्वाथ १६ तोले, गोमूत्र १६ तोले एवं हीराकासीस, सेंधानमक और रसौत इनका चूर्ण समान भाग मिश्रित ८ तोले । सबको एकत्र मिलाकर लेहकी समान पाक करे । फिर कृमिग्रंथिरोगमें इस अवलेहके द्वारा प्रतिसारण किया करे ॥ २४ ॥

वासकादि ।

अटरूषाभयानिम्बधात्रीमुस्ताक्षकूलकैः ।
रक्तस्रावं कफं हन्ति चक्षुषां वासकादिकम् ॥ २५ ॥

अडूसेकी छाल, हरड, नीमकी छाल, आमले, नागरमोथा, बहेडा, परवल इन सबका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर उससे नेत्रोंको सेचन करे, गूगलको डालकर पान करे तो यह वासकादि क्वाथ कफसे उत्पन्नहुए नेत्रस्रावको नष्टकरताहै ॥ २५ ॥