भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११९१


तच्चूर्णं विमलाञ्जनेन सहितं नेत्राञ्जने शस्यते
काचार्मार्जुनपिच्चिटे सतिमिरे स्रावं च निर्वापयेत् ॥८५॥
इमलीके पत्तोंके स्वरसको ताँबेके पात्रमें (या गूलरकी लकडीके बने पात्रमें) रखकर उसमें पोहकर मूल और सैंधानमक डालकर खरल करे। फिर धूपमें सुखाकर बारीक चूर्ण करलेवे। उस चूर्णको काले सुरमेके साथ मिलाकर सलाईसे आँखोंमें आँजे तो इससे काच, अर्म, अर्जुन, पिच्चिट और तिमिररोग एवं नेत्रोंमेंसे जलका गिरना नष्ट होजाता है ॥ ८५ ॥

चित्राषष्ठीयोगे सैन्धवममलं विचूर्ण्य तेनाक्षि ।
सममञ्जनेन तिमिरं गच्छति वर्षादसाध्यमपि ॥ ८६ ॥
चित्रानक्षत्रयुक्त षष्ठी (छठ) तिथिमें सैंधेनमकको बारीक पीसकर आँखोंमें आँजनेसे एक वर्षका पुराना असाध्य तिमिररोगभी नष्ट होता है ॥ ८६ ॥

दद्यादुशीरनिर्य्यूहे चूर्णितं कणसैन्धवम् ।
तत्स्रुतं सघृतं तत्र भूयः क्षौद्रं क्षिपेद्घने ॥
शीते चास्मिन् हितमिदं सर्वजे तिमिरेऽञ्जनम् ॥ ८७ ॥
खसके क्वाथमें पीपलका चूर्ण, सैंधानमकका चूर्ण और घृत डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे। जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें शहद मिलालेवे। फिर इसको नेत्रोंमें लगावे । यह अञ्जन सर्व प्रकारके तिमिररोगोंमें हितकारी है ॥ ८७ ॥

धात्रीरसाञ्जनक्षौद्रसर्पिर्भिस्तु रसक्रिया ।
पित्तानिलाक्षिरोगघ्नीतैमिर्यपटलापहा ॥ ८८ ॥
आमलेका क्वाथ, रसौत, शहद और घृत इनको एकत्र यथाविधि पकाकर नेत्रोंमें डालनेसे पित्तज, वातज चक्षुरोग एवं तिमिर और पटल नष्ट होता है ॥

शृङ्गवेरं भृङ्गराजं यष्टीतैलेन मिश्रितम् ।
नस्यमेतेन दातव्यं महापटलनाशनम् ॥ ८९ ॥
अदरख, भाङ्गरा इनके रसको और मुलहठीके चूर्णको तिलके तेलमें मिलाकर सूँघनेसे महापटल रोगका नाश होता है ॥ ८९ ॥

लिङ्गनाशे कफोद्भूते यथावद्विधिपूर्वकम् ।
विद्धा दैवकृते छिद्रे नेत्रं स्तन्येन पूरयेत् ॥ ९० ॥