भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११९२ | भैषज्यरत्नावली । | [ क्षुद्ररोग- |
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ततो दृष्टेषु रूपेषु शलाकामाहरेच्छनैः ।
नयनं सर्पिषाऽभ्यज्य वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् ॥ ९१ ॥
ततो गृहे निराबाधे शयीतोत्तान एव च ।
उद्गारकासक्षवथुष्ठीवनोत्कम्पनानि च ॥
तत्कालं नाचरेदूर्ध्वं यन्त्रणा स्नेहपीतवत् ॥ ९२ ॥
कफसे उत्पन्न हुए लिङ्गनाश (दृष्टिनाशक) रोगमें विधिपूर्वक स्वभावजन्य छिद्र-को ताँबेकी सलाईसे वेधकर नेत्रोंको स्त्रीके दूधसे भरदेवे। जब कुछ स्वरूप दीखने लगे तब सलाईको धीरे धीरे निकाललेवे और नेत्रोंको घीसे चुपड़कर कपड़ेकी पट्टी से बाँधदेवे। रोगीको धूप, धुआँ और वायुसे रहित स्थानमें चित्त लिटाकर सुला-देवे। एक सप्ताह पर्यन्त रोगीको उद्गार (डकार), खाँसी, छींक, थूकना और कम्प न हो इस विषयमें विशेष लक्ष्य रखना चाहिये और स्नेहपान करनेवालेकी समान पथ्यादिका प्रयोग करना चाहिये ॥ ९०-९२ ॥
त्र्यहात्त्र्यहाद्धारयेत्तत् कषायैरनिलापहैः ॥ ९३ ॥
वायोर्भयात् त्र्यहादूर्ध्वं स्नेहयेदक्षि पूर्ववत् ।
दशरात्रं तु संयम्य हितं दृष्टिप्रसादनम् ॥ ९४ ॥
पश्चात्कर्म च सेवेत लङ्घनं चापि मात्रया ।
रागश्वोषोऽर्बुदं शोथो बुद्बुदं केकराक्षता ॥ ९५ ॥
अधिमन्थादयश्चान्ये रोगाः स्युर्दुष्टवेधजाः ।
अहिताचारतो वापि यथास्वं तानुपाचरेत् ॥ ९६ ॥
फिर तीन तीन दिनके पश्चात् नेत्रोंके बन्धनको खोलकर वातनाशक औषधियोंके क्वाथसे नेत्रोंको धोवे और वायु लगनेके भयसे तीसरे दिन घृतसे नेत्रोंको चुपड़कर पूर्ववत् बाँधदेवे। इस प्रकार करते करते जब दश दिन बीत जायँ तब दृष्टिप्रसन्नता-कारक क्रिया करे और हल्के अन्नको मात्रानुसार देवे। यदि नेत्रोंको कुविधिसे वेधनेसे अथवा रोगीके अहित आचरण करनेसे नेत्रोंमें लाली, चोष, अर्बुद, सूजन, बुद्बुद, केकड़ेकी समान नेत्रोंका होना और अधिमन्थादि दुष्ट रोग उत्पन्न होजायँ तब विधिपूर्वक चिकित्सा कर उनको दूर करे ॥ ९३-९६ ॥
रुजायामक्षिरोगे वा भूयो योगान्निबोध मे ।
कलिकताः सघृता दूर्वायवगैरिकशारिवाः ॥
सुखालेपाः प्रयोक्तव्या रुजारागोपशान्तये ॥ ९७ ॥