भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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११८४ | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग-

सूर्यग्रहण, अग्नि और बिजली इनको अधिक देखनेसे नेत्रोंमें पीडा होनेपर सन्तर्पण एवं स्निग्ध और शीतल क्रिया करे । सायंकालमें त्रिफलाके क्वाथसे नेत्रोंकों सिञ्चन करने अथवा उक्त क्वाथको पीनेसे विशेष उपकार होता है ॥ ४४ ॥

निशाब्दत्रिफलादार्बीसितामधुकसंयुतम् ।
अभिघाताक्षिशूलघ्नं नारीक्षीरेण पूरणम् ॥ ४५ ॥

हल्दी, नागरमोथा, त्रिफला, दारुहल्दी, मिश्री, और मुलहठी इनके चूर्णोंको समान भाग लेकर स्त्रीके दूधमें मिलाकर आँखोंमें भरनेसे अभिघातज नेत्रशूल नष्ट होता है ॥ ४५ ॥

वाताभिष्यन्दवच्चापि वाते मारुतपर्यये ।
पूर्वभक्तं हितं सर्पिःक्षीरं चाप्यथ भोजने ॥ ४६ ॥

अन्यतोवात और वातपर्यायरोगमें वातज अभिष्यन्दके समान चिकित्सा करे और भोजन करनेसे पहले घृतपान तथा भोजनके पश्चात् दुग्धपान करे ॥

वृक्षादन्यां कपित्थे च पञ्चमूले महत्यपि ।
सक्षीरं कर्कटरसे सिद्धं चापि पिबेद् घृतम् ॥ ४७ ॥

बाँदा, कैथ, बृहत्पञ्चमूल इनके कल्क और काकड़ासिंगीके क्वाथमें दूध सहित घृतको पकावे । इस घृतको आगन्तुक नेत्ररोगमें पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ४७ ॥

अधिमन्थमभिष्यंदं रक्तोत्थमथवाऽर्जुनम् ।
शिरोत्पातं शिराहर्षमन्यांश्चोग्रभवान् गदान् ॥
स्निग्धस्याज्येन कौम्भेन शिरावेधैः शमं नयेत् ॥ ४८ ॥

रक्तज अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अर्जुन, शिरोत्पात, शिराहर्ष एवं अन्यान्य घोरतर नेत्ररोगोंको दस वर्षके पुराने घृतको सेवनकर और मस्तकंकी शिराको वेधकर तथा पित्तज अभिष्यन्दनाशक अन्यान्य क्रियाओंको करके नष्ट करना ॥

अम्लाध्युषितशान्त्यर्थं कुर्याल्लेपान्सुशीतलान् ।
तैन्दुकं त्रैफलं सर्पिर्जीर्णं वा केवलं हितम् ।
शिरावेधं विना कार्यः पित्तस्यन्दहरो विधिः ॥ ४९ ॥

अम्लाध्युषितरोगकी शान्तिके लिये शीतल औषधियोंका प्रलेप करे । इसमें तन्दुकघृत, त्रिफलाघृत किंवा एकमात्र पुराना घृत पान करना हितकारी है । इसमें शिरावेध न कर पित्तज अभिष्यन्दनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४९ ॥