भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1217, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1217

चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । ११८५

सर्पिः क्षौद्राञ्जनं च स्याच्छिरोत्पातस्य भेषजम् ।
तद्वत्सैन्धवकासीसं स्तन्यपिष्टं च पूजितम् ॥ ५० ॥
शिरोत्पातरोगमें घृत और मधुके साथ मर्दनकर सौवीराञ्जन एवं स्त्रीके दूधमें सैन्धेनमक और हीराकसीसको पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे शिरोत्पात रोगका नाश होता है ॥ ५० ॥

शिराहर्षेऽञ्जनं कुर्यात्फाणितं मधुसंयुतम् ।
मधुना तार्क्ष्यशैलं वा कासीसं वा समाक्षिकम् ॥ ५१ ॥
व्रणशुक्रप्रशान्त्यर्थं षडङ्गं गुग्गुलुं पिबेत् ।
कतकस्य फलं शङ्खं तिन्दुकं रूपमेव च ॥
कांस्ये निघृष्टं स्तन्येन क्षतशुकार्त्तिरोगजित् ॥ ५२ ॥
शिराहर्षरोगमें राव और शहदका अञ्जन बनाकर नेत्रोंमें लगावे । अथवा रसौतको शहदके साथ किंवा हीराकसीसको शहदके साथ मिलाकर आँखोंमें आँजे व्रण और शुक्ररोगकी शान्तिके लिये षडङ्गगुग्गुलुको पान करे । निर्मलीके फल, शङ्खचूर्ण, तेन्दु और चाँदी इनको समान भाग लेकर काँसीके पात्रमें स्त्रीके दूधके साथ खरलकर नेत्रोंमें लेप करनेसे नेत्रव्रण, शुक्र, लाली, पीडा दूर होय ॥

शिरया वा हरेद्रक्तं जलौकाभिश्च लोचनात् ।
अक्षमज्जाञ्जनं सायं स्तन्येन शुक्रनाशनम् ॥ ५३ ॥
शुक्ररोगमें नेत्रोंकी शिरामेंसे जोंक लगवाकर रक्त निकलवावे । फिर बहेडेकी गिरीको नारीके दूधके साथ पीसकर और शहद मिलाकर सन्ध्यासमय आँखोंमें लगावे । इससे शुक्ररोग नष्ट होता है ॥ ५३ ॥

एकं वा पुण्डरीकं च छागीक्षीरावसेचितम् ।
रागाश्रुवेदनां हन्यात् क्षतपाकात्ययाजकाः ।
तुत्थकं वारिणा युक्तं शुक्रं हन्त्याक्षिपूरणात् ॥ ५४ ॥
केवल एकमात्र पुण्डेरियाको पीसकर वस्त्रमें बाँधकर पोटली बनालेवे, उस पोटलीको बकरीके दूधमें डुबोकर रखदेवे । जब दूध पीला होजाय तब उससे नेत्रोंकों सिञ्चन करे । यह प्रयोग नेत्रोंकी लाली, अश्रुपात, वेदना क्षत एवं पाकादिकों निवारण करता है । तूतियाको जलमें घिसकर आँखोंमें पूरनेसे शुकरोग नष्ट होता है ॥ ५४ ॥

७५