भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1218, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११८६ | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग- |
|---|
समुद्रफेनदक्षाण्डत्वक्सिन्धूत्थैः समाक्षिकैः ।
शिग्रुबीजयुतैर्वर्त्तिः शुक्रघ्नी शिग्रुवारिणा ॥ ५५ ॥
समुद्रफेनका चूर्ण, मुर्गीके अण्डेका छिलका, सैंधानमक और सहिंजनेके बीज इन सबको शहद और सहिंजनेके रसमें खरल करके बत्ती बनालेवे । यह बत्ती नेत्रोंमें लगानेसे शुक्ररोगको नष्ट करती है ॥ ५५ ॥
धात्रीफलं निम्बकपित्थपत्रं यष्ट्याह्नलोध्रं खदिरं
तिलाश्च । क्वाथः सुशीतो नयने निषिक्तं सर्वप्रकारं
विनिहन्ति शुक्रम् ॥ ५६ ॥
आमले, नीमके पत्ते, कैथके पत्ते, मुलहठी, लोध, खैर और तिल इनके शीतल क्वाथके द्वारा नेत्रोंमें छीटे लगानेसे यह क्वाथ सर्वप्रकारके शुक्ररोगको नष्टकरताहै॥
क्षुण्णपुन्नागपत्रेण परिभावितवारिणा ।
श्यामाक्वाथाम्बुना वाथ सेचनं कुसुमापहम् ॥ ५७ ॥
नागकेशरके पत्तोंको कुचलकर भावना देकर निकालेहुए रससे अथवा श्यामल-ताके क्वाथसे नेत्रोंको सिञ्चन करनेसे कुसुमनामक नेत्ररोग दूरहोताहै ॥
दक्षाण्डत्वक्शिलाशङ्खकाच चन्दनगैरिकैः ।
तुल्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्म्मादिविलेखनः ॥ ५८ ॥
मुर्गीके अण्डेका छिलका, मैनसिल, शंखचूर्ण, कांच, लालचन्दन और गेरू इनको एकत्र पीसकर नेत्रोंमें आँजनेसे यह योग कुसुम और अर्मादि रोगको विनाश करता है ॥ ५८ ॥
शिरीषबीजमरिचपिप्पलीसन्धवैरपि ।
शुक्रे प्रघर्षणं कार्यमथवा सैन्धवेन च ॥ ५९ ॥
सिरसके बीज, कालीमिरच, पीपल और सैंधानमक इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहदमें खरल करके सलाईसे नेत्रोंमें लगावे अथवा सैंधेनमकसे घर्षण करे तो शुक्र (फूली) रोग नष्ट होता है ॥ ५९ ॥
बहुशः पलाशकुसुमस्वरसैः परिभाविता जयत्यचिरात् ।
नक्ताह्वबीजवर्त्तिः कुसुमचयं दृक्षु चिरजमपि ॥ ६० ॥
करञ्जके बीजोंके चूर्णको ढाकके फूलोंके स्वरससे सात दिनतक भावना देकर बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको नेत्रोंमें लगानेसे बहुत पुराना कुसुमरोगभी तत्काल नष्ट होता है ॥ ६० ॥