भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८७
सैन्धवत्रिफलाकृष्णाकटुका शङ्खनाभयः ।
सताम्ररजसो वर्त्तिः पिष्टा शुक्रविनाशिनी ॥ ६१ ॥
सैंधानमक, त्रिफला, पीपल, कुटकी, शंखनाभि, ताँवेकी भस्म इन सबकों शहदमें घोटकर बत्ती बनालेवे। फिर उसके द्वारा अंजन लगावे तो नेत्र शुक्र दूर होय ॥
चन्दनं सैन्धवं पथ्या पलाशतरुशोणितम् ।
क्रमवृद्धमिदं चूर्णं शुक्रार्मादिविलेखनम् ॥ ६२ ॥
लालचन्दन, सैंधानमक, हरड और ढाकका गोंद इन सबको क्रमशः बढाता हुआ लेवे । फिर सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके शहदमें मिलाकर सलाईसे लगावे तो नेत्रोंका शुक्र और अर्मादिरोग नाश होता है ॥ ६२ ॥
शङ्खस्य भागाश्चत्वारस्ततोऽर्धेन मनःशिला ।
मनःशिलार्द्धं मरिचं मरिचार्द्धेन सैन्धवम् ॥
एतच्चूर्णाञ्जनं श्रेष्ठं शुक्रार्मातिमिरेषु च ॥ ६३ ॥
शंखनाभि ४ भाग, मैनसिल २ भाग, कालीमिरच १ भाग और सैंधानमक आधाभाग इन सबके चूर्णको शहदमें मिलाकर सलाईके द्वारा नेत्रोंके शुक्र, अर्म और तिमिर रोगमें आँजना श्रेष्ठ है ॥ ६३ ॥
ताप्यंमधुकसारो वा बीजमक्षस्य सैन्धवम् ।
मधुनाऽञ्जनयोगाः स्युश्चत्वारः शुक्रशान्तये ॥ ६४ ॥
सोनामाखी, मुहलठीका सत्त, बहेडेकी गुठलीकी मींग और सैंधानमक इन चारोंमेंसे किसी एकको शहदमें मिलाकर नेत्रोंमें आँजनेसे शुक्ररोग शमन होता है। ये चारों ही योग शुक्ररोग नाशक हैं ॥ ६४ ॥
वटक्षीरेण संयुक्तं श्लक्ष्णं कर्पूरजं रजः
क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति शुक्रं चापि घनोन्नतम् ॥६५॥
कर्पूरको खूब बारीक पीसकर बडके दूधमें मिश्रित करके आँखोंमें आँजनेसे अत्यन्त घन और उन्नत शुक्ररोगभी तत्काल नष्ट होता है ॥ ६५ ॥
तालस्य नारिकेलस्य तथैवारुष्करस्य च ।
करीषस्य च वंशानां कृत्वा क्षारं परिस्रुतम् ॥ ६६ ॥
करभास्थिकृतं चूर्णं क्षारेण परिभावितम् ।
सप्तकृत्वोऽष्टकृत्वो वा श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत ॥ ६७ ॥