भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1220
११८८भेषज्यरत्नावली[ नेत्ररोग-

एतच्छुक्रेष्वसाध्येषु कृष्णीकरणमुत्तमम् ।
यानि शुक्राणि साध्यानि तेषां परममञ्जनम् ॥ ६८ ॥
ताड़की जटा, नारियलकी गिरी, भिलावे और बाँसके अंकुर इन सबको तिलनालकी अग्निके द्वारा पृथक् पृथक् भस्मकर सबका क्षार ग्रहण करे । फिर उस क्षारको आठगुने जलमें पकावे । जब चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उसको २१ बार छाने, उस जलमें ऊँटकी हड्डीका चूर्ण डालकर सात अथवा आठ दिनतक खरल करे । जब अच्छे प्रकार घुटकर बारीक होजाय तब सुखाकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उसको शहदमें मिलाकर सलाईसे आँखोंमें लगावे तो यह असाध्य शुक्ररोगमें फूलीको दूरकर तत्काल कृष्णताको उत्पन्न करता है और साध्यशुक्रको नष्ट करनेके लिये तो यह परमोत्तम अञ्जन है ॥ ६६–६८ ॥

अजकां पार्श्वतो विद्ध्वा सूच्या विस्राव्य चोदकम् ।
व्रणं गोमयचूर्णेन पूरयेत्सर्पिषा सह ॥ ६९ ॥
अजका नामक नेत्ररोगमें नेत्रके समीपकी शिराको सुईसे बेधकर जल निकाले उस व्रणको उपलोंके चूर्णके साथ घृत मिलाकर लगानेसे नेत्रव्रण शीघ्र भरजाता है ॥ ६९ ॥

सैन्धवं वाजिपादं च गोरोचनसमन्वितम् ।
शेलुत्वग्रससंयुक्तं पूरणं चाजकापहम् ॥ ७० ॥
सैंधानमक, घोडेकी खुर और गोरोचन इनको समान भाग लेकर लसौडेकी छालके रसमें मिलाकर आँखोंमें भरनेसे अजकारोग दूर होता है ॥ ७० ॥

लिह्यात्सदा वा त्रिफलां सुचूर्णितां घृतप्रगाढां तिमिरेऽथ पित्तजे ।
समीरजे तैलयुतां कफात्मके मधुप्रगाढां विदधीत युक्तितः ॥ ७१ ॥
पित्तजतिमिररोगमें त्रिफलेके चूर्णको घृतके साथ, वातजतिमिरमें तेलके साथ और कफजतिमिररोगमें मधुके साथ मिलाकर युक्तिपूर्वक भक्षण करे ॥ ७१ ॥

कल्कः क्वाथोऽथवा चूर्णं त्रिफलाया निषेवितम् ।
मधुना सर्पिषा वापि समस्ततिमिरापहम् ॥ ७२ ॥
त्रिफलेका कल्क, क्वाथ अथवा चूर्ण, मधु और घृतके साथ मिश्रितकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके तिमिररोग नष्ट होते हैं ॥ ७२ ॥

यस्त्रैफलं चूर्णमपथ्यवर्जी सायं समश्नाति हविर्मधुभ्याम् ।
स मुच्यते नेत्रगतैर्विकारैर्भृत्यैर्यथा क्षीणधनो मनुष्यः ॥ ७३ ॥