भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1215, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ११८४
जलौकापातनं शस्तं नेत्रपाके विरेचनम् ।
शिरावेधं प्रकुर्वीत सेकलेपांश्च शुक्रवत् ॥ ३९ ॥
नेत्ररोगकी पक्क अवस्था में जोंक लगवाकर रक्तमोक्षण, विरेचन ( दस्त ) और शिरावेध करे एवं नेत्रशुक्रकी समान सेक और प्रलेप करे ॥ ३९ ॥
विभीतकशिवाधात्रीपटोलारिष्टवासकैः ।
क्वाथो गुग्गुलुना पेयःशोथपाकाक्षिशूलहा ॥ ४० ॥
पिल्वं च सव्रणं शुक्लं रागादींश्चापि नाशयेत् ।
एतैश्चापि घृतं पक्वं रोगांस्तांश्च व्यपोहति ॥ ४१ ॥
बहेडा, हरड, आमला, पटोलपात, नीमकी छाल, और अडूसेकी छाल इनके द्वारा सिद्ध कियाहुआ क्वाथ गूगल डालकर पीनेसे नेत्रोंकी सूजन, नेत्रपाक, शूल, पिल्व, व्रण, शुक्र, और लालीको नष्ट करता है अथवा उक्त समस्त द्रव्योंके क्वाथ और गूगलके कल्क द्वारा सिद्ध कियेहुये घृतको सेवन करनेसेभी उल्लिखित सम्पूर्ण दोष नष्ट होते हैं ॥ ४० ॥ ४१ ॥
नेत्रे त्वभिहते कुर्याच्छीतमाश्च्योतनादिकम् ॥
अभिघातजनित नेत्ररोगमें शीतलद्रव्यों द्वारा नेत्रमें आश्च्योतनादि कर्मकरे ॥
दृष्टिप्रसादजननं विधिमाशु कुर्यात् स्निग्धैर्हिमैश्च मधुरैश्च तथा प्रयोगैः । स्वेदाग्निधूमभयशोक रुजा-
भितापैरभ्याहतानपि तथैव भिषक् चिकित्सेत् ॥ ४२ ॥
धूप, अग्नि, धुआँ, भय, शोक, आघात और अभिताप इन कारणोंसे उत्पन्न हुए नेत्ररोगमें स्निग्ध, शीतल और मधुरद्रव्योंका प्रयोग एवं दृष्टिको निर्मल करनेवाली विधि शीघ्रही करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
आगन्तुदोषं प्रसमीक्ष्यकार्यं वक्त्रोष्मणा स्वेदनमादि-
तस्तु । आश्च्योतनं स्त्रीपयसा च सद्यो यच्चापि पित्त-
क्षतजापहं स्यात् ॥ ४३ ॥
धूल आदिके पडजानेसे नेत्राभिष्यन्द हुआ हो तो प्रथम मुँहकी भापसे फूँक फूँककर स्वेद देवे। फिर स्त्रीका दूध आँखोंमें टपकावे और पित्तज अभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्दके समान चिकित्सा करे ॥ ४३ ॥
सूर्योपरागानलविद्युदादिविलोकनेनापि हतेक्षणस्य ।
सतर्पणं स्निग्धहिमादि कार्यं सायं निषेव्यास्त्रिफलाप्रयोगाः ॥