भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११८४ | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग- |
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पिष्टैर्निम्बस्य पत्रैरतिविमलतरैर्जातिसिन्धूत्थमिश्रै-
रन्तर्गर्भं दधाना पटुतरगुडिका पिष्टलोध्रेण भृष्टा ।
तूलैः सौवीरसान्द्रैरतिशयसृदुभिर्वेष्टिता सा समन्ता-
च्चक्षुःकोपप्रशान्तिं चिरमुपरि दृशोर्भ्राम्यमाणा करोति ॥३४॥
नीमके पत्ते, चमेलीके फूल और सेंधानमक इनको एकत्र पीसकर गोलासा बनावे । उस गोलेके बीचमें घीमें भूनकर लोधके चूर्णको रखकर गुटिका बनावे । फिर उस गुटिकाको काँजीमें भिजाई हुई रुईके द्वारा चारों ओरसे लपेटकर नेत्रोंके ऊपर बारबार फिरावे । यह गुटिका बहुत पुराने चक्षुरोगको शीघ्र नष्ट कर देती है ॥ ३४ ॥
बिल्वपत्ररसं साम्लं निघृष्टं ताम्रभाजने ।
सिन्धूत्थकटुतैलाक्तं कुर्यान्नेत्रस्रवादिषु ॥ ३५ ॥
बेलपत्रीके रस, काँजी, सेंधेनमक और कडवे तेलको एकत्रकर ताँबेके बर्त्तनमें अच्छेप्रकार घिसकर नेत्रोंमें लगावे । यह प्रयोग नेत्रस्राव होनेमें विशेष हितकर है ॥
सलवणकटुतैलं काञ्जिकं कांस्यपात्रे घनितमुपलघृष्टं
धूपितं गोमयाग्नौ । सपवनकफकोपं छागदुग्धावसिक्तं
जयति नयनशूलं स्रावशोथं सरागम् ॥ ३६ ॥
सेंधानमक, कडवा तेल और काँजी इनको काँसेके पात्रमें पत्थरसे घोटे, जब घोटते २ खूब गाढा होजाय तब आरने उपलोंकी अग्निमें डालकर धूप देवे और बकरीके दूधमें मिलाकर आँखोंमें लगावे । इससे वातज और कफज नेत्रशूल, स्राव, शोथ और लाली दूर होती है ॥ ३६ ॥
तरुस्थविद्धामलकरसः सर्वाक्षिरोगनुत् ।
पुराणं सर्वथा सर्पिः सर्वनेत्रामयापहम् ॥ ३७ ॥
आमलॉँके पेडमें सुई छेदकर रस निकाले, उस रसको आँजनेसे सर्वप्रकारके नेत्ररोग नष्ट होते हैं । एवं पुराने घीको पान, नस्य और लगानेसे सर्वनेत्ररोग दूर होते हैं ॥ ३७ ॥
अयमेव विधिः सर्वो मन्थादिष्वपि शस्यते ।
अशान्तौ सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् ॥ ३८ ॥
यही उपर्युक्त समस्त विधि अधिमन्थरोगमें भी करनी चाहिये । यदि उक्तक्रियाके द्वारा अधिमन्थरोग शान्त न हो तो दोनों भौंहोंके ऊपर दाग देवे ॥