भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८० भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग
वनतुलसी विशेष, आस्फोतलता, कैथ, बेल, शालिश्चशाक, पीलुवृक्ष, तुलसी और अर्ज (तुलसीभेद) इनमेंसे किसी एक वृक्षके पत्तोंको पीसकर कुछएक गरम करके नेत्रोंके बाहर पलकोंपर सेक करे अथवा सुगन्धवाला, सोंठ, देवदारु और कूठ इनको एकत्र पीसकर पलकोंपर लेप करे तो नेत्ररोग दूर होता है ॥२३॥
शुण्ठीनिम्बदलैः पिण्डः सुखोष्णैः स्वल्पसैन्धवैः ।
धार्यश्चक्षुषि संक्षेपाच्छोथकण्डूव्यथापहः ॥ २४ ॥
सोंठ और नीमके पत्तोंको एकत्र पीसकर उसमें थोडासा सैंधानमक डालकर गोलासा बनावे। उस गोलेको गरम करके सुहाता २ कपडेमें बांधकर आँखोंके ऊपर धारण करनेसे नेत्रोंकी सूजन, खुजली और पीडा नष्ट हो जाती है ॥
वल्कलं पारिजातस्य तैलकाञ्जिकसैन्धवम् ।
कफोद्भूताक्षिशूलघ्नं तरुघ्नं कुलिशं यथा ॥ २५ ॥
फरहदकी छालका रस, कडवा तेल, काँजी और सैंधानमक इन सबको एकत्र मिलाकर जब खूब गाढा न हो जाय तबतक ताँबेके पात्रमें कौडीसे खरल करे । फिर इस अञ्जनको आँखोंमें अँजे तो यह कफसे उत्पन्नहुए नेत्रोंके शूलको इस प्रकार नष्ट करदेता है, जिसप्रकार वज्र वृक्षको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ २५ ॥
ससैन्धवं लोध्रमथाज्यभृष्टं सौवीरपिष्टं सितवस्त्रबद्धम् ।
आश्च्योतनं तन्नयनस्य कार्यं कण्डूं च दाहं च रुजां च हन्यात् ॥
सैंधानमक और लोध इनको घृतमें भूनकर काँजीमें पीसकर सफेद कपडेमें बांधकर पोटली बनालेवे । फिर उस पोटलीमेंसे निष्पीडित रसको नेत्रोंमें टपकावे । इससे खुजली, दाह और नेत्रपीडा कम होती है ॥ २६ ॥
स्निग्धैरुष्णैश्च वातोत्थः पित्तजो मृदुशीतलैः ।
तीक्ष्णरूक्षोष्णविशदैः प्रशाम्यन्ति कफात्मकः ॥
तीक्ष्णोष्णमृदुशीतानां शान्तः स्यात्सान्निपातिकः ॥ २७ ॥
वातज नेत्ररोगमें स्निग्ध और उष्णक्रिया, पित्तज नेत्ररोगमें मृदु और शीतल क्रिया, कफज नेत्ररोगमें तीक्ष्ण, उष्ण और रूक्ष क्रिया एवं त्रिदोषज नेत्ररोगमें तीनों दोषोंकी मिलीहुई चिकित्सा करनेसे उक्त रोग शमन होते हैं ॥ २७ ॥
तिरीटत्रिफलायष्टिशर्कराभद्रमुस्तकैः ।
पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ॥ २८ ॥