भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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११७८ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-

गेरू, लालचन्दन, सोंठ, खडिया मिट्टी और वच इनको सम भाग लेकर एकत्र पीसकर आँखोंके बाहर पलकोंपर लेप करनेसे नेत्ररोग निस्सन्देह नष्ट होता है ॥

भूम्यामलकी घृष्टा सैन्धवगृहवारियोजिता ताम्रे ।
याता घनत्वमक्ष्णोर्जयति बहिर्लेपतः पीडाम् ॥ १२ ॥

भुईं आमला और सेंधानमक इनको काँजीके द्वारा ताँबेके पात्रमें घिसे। जब घिसते घिसते खूब गाढा होजाय तब उसका नेत्रोंपर लेप करे । यह लेप नेत्रपीडाको दूर करता है ॥ १२ ॥

आश्च्योतनं मारुतजे क्वाथो बिल्वादिभिर्हितः ।
कोष्णः सैरण्डबृहतीतर्कारीमधुशिग्रुभिः ॥ १३ ॥

वातज नेत्ररोगमें बिल्वादिपञ्चमूल, अण्डकी जड, बडी कटेरी, जयन्ती और सहिंजनेकी छाल इनके क्वाथमें शहद डालकर उसके द्वारा आश्च्योतनकर्म करना अर्थात् सुहाता २ नेत्रोंमें डालना हितकर है ॥ १३ ॥

एरण्डपल्लवे मूले त्वचि वाऽऽजापयः शृतम् ।
कण्टकार्याश्च मूलेषु सुखोष्णं सेचने हितम् ॥ १४ ॥

अण्डके पत्ते, जड, छाल और कटेरीकी जड इन सबने साथ बकरीके दूधको पकाकर उसको सुहाता २ लेकर नेत्रोंमें सेकन करनेसे सुख होता है ॥ १४ ॥

संपक्वेऽक्षिगदे कार्यमञ्जनादिकमिष्यते ।
प्रशस्तवर्त्मता चाक्ष्णोः संरम्भाश्रुप्रशान्तता ॥
मन्दवेदनता कण्डूः पक्वाक्षिगदलक्षणम् ॥ १५ ॥

नेत्ररोगकी पक्व अवस्थामें अञ्जनादिका व्यवहार करना हितकारी है । नेत्रोंकें मार्गमें प्रशस्तता, शोथ, आँसुओंके वेगकी शान्ति एवं खुजली और वेदनाका मन्द मन्द होना ये सब पक्व नेत्ररोगके लक्षण जानने चाहिये ॥ १५ ॥

बृह्त्येरण्डमुलत्वक् शिग्रोर्मूलं ससैन्धवम् ।
अजाक्षीरेण पिष्टं स्याद्वर्त्तिर्वाताक्षिरोगनुत् ॥ १६ ॥

बडी कटेरीकी जडकी छाल, अण्डकी जडकी छाल, सहिंजनेकी जडकी छाल और सेंधानमक इनको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें खरल करके बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको आँखोंमें लगानेसे वातज नेत्ररोग नष्ट होता है ॥ १६ ॥

हरिद्रे मधुकं द्राक्षां देवदारु च पेषयेत् ।
आजेन पयसा श्रेष्ठमभिष्यन्दे तदञ्जनम् ॥ १७ ॥