भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा [ ] भाषाटीकासहिता । ११५९
व्यवहार करें। यह गुटिका उक्त रोगमें अमृतके समान गुणकारी है ॥ ८० ॥ ८१ ॥
स्वल्पखदिरवटिका।
खदिरस्य तुलां सम्यक् जलद्रोणे विपाचयेत् ।
शेषेऽष्टभागे तत्रैव प्रतिवापं प्रदापयेत् ॥ ८२ ॥
जातीकर्पूरपूगानि कङ्कोलफलानि च ।
इत्येषा गुडिका कार्या मुखसौभाग्यवर्द्धिनी ॥
दन्तौष्ठमुखरोगेषु जिह्वाताल्वामयेषु च ॥ ८३ ॥
खैरको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर आठवाँ भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस क्वाथको दुबारा चूल्हेपर चढा-कर मन्दमन्द अग्निसे पकावे। पकते पकते जब वह गाढा पडजाय तब उसमें जावित्री, कपूर, सुपारी, काकोली और जायफल इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले डालकर सबको अच्छे प्रकार मिलाकर गोलियाँ बनालेवे। यह वटी मुखमें धारण करनेसे मुखकी शोभाको बढाती है एवं दन्त, ओष्ठ, मुख, जिह्वा और तालु आदि सब मुखरोगोंमें विशेष हितकारी है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
बृहत्खदिरवटिका।
गायत्रिसारतुलमेरिमवल्कलानां सार्द्धं तुलायुगलमम्बु-
घटैश्चतुर्भिः । निःक्वाथ्य पादमवशिष्टसुवस्त्रपूतं भूयः
पचेदथ शनैर्मृदुपावकेन ॥ ८४ ॥ तस्मिन्घनत्व-
मुपगच्छति चूर्णमेषां श्लक्ष्णं क्षिपेच्च कवलग्रहभागिका-
नाम्।एलामृणालसितचन्दनचन्दनाम्बुश्यामातमाल-
विकषाघनलौहयष्टी ॥ ८५ ॥ लज्जाफलत्रयरसाञ्जन-
धातकीनां श्रीपुष्पगैरिककटङ्कट्कट्फलानाम्। पद्माह्व-
लोध्रवटरोहयवासकानां मांसीनिशासुरभिवल्कलसंयु-
तानाम् ॥ ८६ ॥ कक्कोलजातिफलकोषलवङ्गकानि
चूर्णीकृतानि विदधीत पलांशिकानि । शीतेऽवतार्य-
घनसारचतुःपलं च क्षिप्त्वा कलायसदृशीर्गुडिकाः
प्रकुर्यात्॥८७॥शुष्का मुखे विनिहिता विनिवारयन्ति