भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1190
११९८भैषज्यरत्नावली ।[ मुखरोग-

एतेषां समभागेन चूर्णमेव विनिर्दिशेत् ।
तत्समं प्रक्षिपेत्तत्र चूर्णं कठिनसम्भवम् ॥
एतद्दशनसंस्कारचूर्णं दन्तास्यरोगजित् ॥ ७८ ॥

सोंठ, हरड, नागरमोथा, खैर, कपूर, सुपारीकी भस्म, मिरच, लौंग और दारचीनी इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णकी बराबर उसमें खडियामिट्टी मिलालेवे । यह दशनसंस्कारचूर्ण है । इसको प्रतिदिन दाँतोंमें मलनेसे दन्तरोग और मुखरोग शीघ्र दूर होते हैं ॥ ७७ ॥ ७८ ॥

दन्तरोगाशनिचूर्णं ।

जातीपत्रपुनर्नवा तिलकणा कौरण्टमुस्ता वचा
शुण्ठी दीप्यहरीतकी च सघृतं चूर्णं मुखे धारयेत् ॥
वातघ्नं कृमिकण्डुशूलदहनं सर्वामयध्वंसनं
दौर्गन्ध्यादिसमस्तदोषहरणं दन्तस्य रोगाशनिः ॥ ७९ ॥

चमेलीके पत्ते, पुनर्नवा, तिल, पीपल, पीलीकटसरैयाके पत्ते, नागरमोथा, वच, सोंठ, अजवायन और हरड इनके चूर्णको समान भाग लेकर घृतमें मिश्रित कर मुखमें धारण करे । इससे वातजदन्तरोग, दाँतोंके कीडे, खुजली, शूल, दाह और मुखकी दुर्गन्धप्रभृति जितने दन्तसम्बन्धी रोग हैं वे सब ध्वंस हो जाते हैं । यह चूर्ण दन्तरोगके लिये वज्रके समान है ॥ ७९ ॥

क्षारगुटिका ।

पञ्चकोलकतालीशपत्रैलामरिचत्वचः ।
पलाशमुष्ककक्षारयवक्षाराश्च चूर्णिताः ॥ ८० ॥
गुडे पुराणे क्वथिते द्विगुणे गुडिकाः कृताः ।
कर्कन्धुमात्राः सप्ताहं स्थिता मुष्ककभस्मनि ॥
कण्ठरोगेषु सर्वेषु धार्याः स्युरमृतोपमाः ॥ ८१ ॥

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, तालीसपत्र, तेजपात, इलायची, मिरच, दारचीनी, ढाकका खार, मोखावृक्षका खार और जवाखार इनके चूर्णको समान भाग लेवे और समस्त चूर्णसे दुगुना पुराना गुड लेवे । सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर पाक करे । जब पाक पूर्ण होजाय तब उतारकर बेरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको मोखावृक्षकी भस्ममें मिलाकर रख देवे । फिर सात दिनके बाद निकालकर उन गोलियोंको सर्व प्रकारके कण्ठरोगमें