भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1235, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1235

[चिकित्सा] भाषाटीकासहित । १२०३

नीलेकमलके पत्ते १००, मूँगके दाने १००, भूसीरहित जौ १००, चमेलीके फूल १०० और पीपलके चावल १०० इन सबको एकत्र जलके साथ खरल करके बत्ती बनालेवे । यह बत्ती सर्वप्रकारके नेत्ररोगोंमें आँजनी चाहिये । तिमिर, अश्रुपात, काच और पटलादि रोगोंको नष्ट करनेके लिये इससे बढकर अन्य उपाय नहीं है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥

सप्तामृतलौह ।

त्रिफलारज आयसं च चूर्णं सहयष्टीमधुकं समांश-
युक्तम् । मधुना सह सर्पिषा दिनान्तेपुरुषो निष्परिहार-
माददीत ॥ ५३॥ तिमिरक्षतरक्तराजिकण्डूक्षणदान्ध्या-
र्बुदतोददाहशूलान् । पटलं सहरक्तकाचपिल्वं शमय-
त्येव निषेवितः प्रयोगः ॥ ५४ ॥

हरड, आमला, बहेडा और मुलहठी इनका चूर्ण एक एक तोला, लोहचूर्ण ४ तोले लेकर जलमें पीसकर पुनः शहद और घीमें मिलाकर सायङ्कालमें सेवन करे । यह लोह तिमिर, क्षत, रक्तराजी, कण्डू, रात्र्यन्धता, अर्बुद, तोद दाह, शूल, पटल, रक्त, काच और पिल्वादि रोगोंको सेवन करतेही शमन करता है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

न च केवलमेव लोचनानां विहितो रोगनिबर्हणाय
पुंसाम् । दशनश्रवणोर्द्धकण्ठजानां प्रशमे हेतुरयं महा-
गदानाम् ॥ ५५ ॥ दयिताभुजपंजरोपगूढः स्फुटचन्द्रा-
भरणासु यामिनीषु । सुरतानि चिरं निषेवतेऽसौ पुरुषो
योगवरं निषेवमाणः ॥ ५६ ॥ मुखेन नीलोत्पलचारु-
गन्धिना शिरोरुहैरंजनमेचकप्रभैः । भवेच्च गृध्रस्य
समानलोचनःसुखैरनरोवर्षशतं च जीवति ॥ ५७ ॥

यह लोह केवल नेत्ररोगोंकोही दूर करनेके लिये नहीं विधान किया गया है, बल्कि दन्त, कर्ण, शिर और कण्ठजन्यरोग तथा अन्यान्य बडे बडे भयंकर रोगोंके नाशका मुख्य हेतु है । इस उत्तम प्रयोगका सेवन करनेवाला पुरुष स्त्रीके भुजारूपी पींजरेमें छिपा हुआ, खिली हुई चाँदनीवाली रात्रियोंमें विषयसुखोंको चिरकालतक भोगता है । इससे मुख नीलकमलकी समान मनोरम सुगन्धियुक्त होता है और शिरके बाल अञ्जनके समान काले होजाते हैं तथा दृष्टिशक्ति गिद्धके समान