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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1236
१२०४भैषज्यरत्नावली ।[ नेत्ररोग-

अत्यन्त सूक्ष्म होती है। इसका सेवन कर्त्ता पुरुष सुखपूर्वक सौ वर्षतक जीता है ॥ ५५-५७ ॥

नयनामृतलौह ।

त्रिकटु त्रिफला शृङ्गी शठी रास्ना महौषधम् ।
द्राक्षा नीलोत्पलं चैव काकोली मधुयष्टिका ॥ ५८ ॥
वाट्यालकं केशरं च कण्टकारीद्वयं तथा ।
लौहाभ्रयोः पलं दत्त्वा भावयेद्वक्ष्यमाणजैः ॥ ५९ ॥
त्रिफलाक्वाथतैलेन भृङ्गराजरसेन च ।
भावयित्वा वटी कार्या बदरास्थिमिता शुभा ॥
यावन्तो नेत्ररोगाश्च तान्निहन्ति न संशयः ॥ १६० ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, काकड़ासिंगी, कचूर, रायसन, सोंठ, दाख, नीलेकमलकी जड, काकोली, मुलहठी, खिरेंटी, नागकेशर, कटेरी, बडी कटेरी इन सब औषधियोंका चूर्ण समान भाग मिश्रित ८ तोले और लोहे तथा अभ्रकका चूर्ण चार चार तोले लेकर एकत्र कूट पीसलेवे । फिर समस्त चूर्णको त्रिफलेके क्वाथ, तिलके तेल और भाँगरेके रसमें सातवार क्रमपूर्वक भावना देकर उसकी बेरकी गुठलीके बराबर उत्तम गोलियाँ बनालेवे । यह बटी प्रतिदिन नियमबद्ध होकर आँजनेसे जितने नेत्रसम्बन्धी रोग हैं उन सबको निस्सन्देह नष्ट करती है ॥ ५८-१६० ॥

नेत्राशानिरस ।

अभ्रं ताम्रं रसं लौहं माक्षिकं च रसाञ्जनम् ।
पातनायन्त्रसंशुद्धं गन्धकं नवनीतकम् ॥ ६१ ॥
पलप्रमाणं प्रत्येकं गृह्णीयाच्च विधानवित् ।
सर्वमेकीकृतं चूर्णं वैद्यैः कुशलकर्मभिः ॥ ६२ ॥
ततस्तु भावना कार्या त्रिफलाभृङ्गराजकैः ।
ततः प्रपिष्य चूर्णं च पिप्पलीमूलयष्टिका ॥ ६३ ॥
एला पुनर्नवा दारु पाठा भृङ्गशठी वचा ।
नीलोत्पलं चन्दनं च श्लक्ष्णचूर्णं च दापयेत् ॥ ६४ ॥
माषमेकं प्रदातव्यं घृतश्रीमधुमर्दितम् ।
मर्द्दनं लौहदण्डेन पात्रे लौहमये दृढे ॥ ६५ ॥

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