भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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९२ भैषज्यरत्नावली । [ रस-

खरल करके तीन २ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे. सब प्रकारके ज्वर विशेषकर आम- युक्त ज्वरमें इसकी एक एक गोली प्रतिदिन सेवन करनेसे विशेष लाभ होता है। यह रस श्वास खाँसी और मन्दाग्निको भी नष्ट करता है। इस सर्वाङ्गसुन्दर रसको पूर्वकाल में ब्रह्माजीने निर्माण किया था ॥ २६-२८ ॥

त्रिपुरभैरवरस ।

विषटङ्कबलिम्लेच्छदन्तीबीजं क्रमाद्वहु । दन्त्यम्बुमर्दितं यामं रसस्त्रिपुरभैरवः ॥ २९ ॥ वल्लं व्योषेण चार्द्रस्य रसेन सितयाऽथवा । दत्तो नवज्वरं हन्ति मान्यमानिलशोथहा ॥ ३० ॥ हन्ति शूलं सविष्टब्धमर्शांसि कृमिजान् गदान् । पथ्यं तक्रेण भोक्तव्यं रसेऽस्मिन् रोगहारिणि ॥ ३१ ॥

शुद्ध वत्सनाभ १ तोला, सुहागा २ तोले, गन्धक ३ तोले, ताम्रभस्म ४ तोले और जमालगोटे ५ तोले ले सबको एकत्र दन्तीके काथमें एक प्रहरतक खरलकरके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एक एक गोली त्रिकुटेके चूर्ण, अदरखके रसके अथवा मिश्रीमें मिलाकर देनेसे नवीनज्वर, शीघ्र नष्ट होता है तथा अग्निकी मन्दता, आमवात, और शोथ दूर होता है यह रस आठ प्रकारके शूल, विष्टम्भ, अर्श और कृमिरोगको नष्ट करता है। इस रसके सेवन करनेपर तक्रके साथ भातका भोजन करना चाहिये ॥ २९-३१ ॥

ज्वर

भवेत्समं सूतसमुद्रफेनहिंगूलगन्धौ परिमर्द्य यत्नात् । नवज्वरे वल्लमितं त्रिघस्रमार्द्राम्बुनाऽयं ज्वरधूमकेतुः ॥३२॥

पारे और गन्धककी कज्जली २ तोले, समुद्रफेन और सिंग्रफ ये प्रत्येक एक एक तोला लेकर सबको एकत्र अदरखके रसके साथ तीन दिनतक यत्नपूर्वक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर एक एक गोली अदरखके स्वरसके साथ सेवन करे । यह ज्वरधूमकेतुरस नवीनज्वरमें विशेष उपकार करता है ॥ ३२ ॥

मृत्युञ्जयरस ।

विषस्यैकस्तथा भागो मरिचं पिप्पलीकणः । गन्धकस्य तथा भागो भागः स्याट्टङ्कणस्य वै ॥ ३३ ॥