भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1246

१२१४ भैषज्यरत्नावली । [ शिरोरोग-

अर्द्धावभेदक और सूर्यावर्त्तरोगमें चीनी मिलाहुआ दूध अथवा नारियलका जल पान करे अथवा शीतल पानीयद्रव्योंमें घृत मिलाकर नास लेवे तो उक्त दोनों प्रकारका शिरोरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥

तिलात्कल्कं सनलदं सक्षौद्रलवणान्वितम् ।
तेनास्य लेपयेच्छीर्षमर्द्धभेदो व्यपोहति ॥१५॥

कालेतिल और बालछड दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर शहद, सेंधा-नमकके साथ मिश्रित करके लेपकरनेसे अर्द्धावभेदक शिरोरोग दूर होताहै ॥

सविडङ्गं तिलं कृष्णं समं कृत्वा प्रपेषयेत् ।
नस्यकर्मणि दातव्यमर्द्धभेदं विनाशयेत् ॥१६॥

वायविडङ्ग और काले तिल इनको सम भाग लेकर बारीक पिसकर इनकी नस्य लेवे तो इससे अर्द्धावभेदक रोग नाश होता है ॥ १६ ॥

दग्धचुल्लीम्मृत्तिकायाश्चूर्णं मरिचचूर्णकम् ।
समांशं मिलितं कुर्यान्नस्यमर्धावभेदके । १७ ॥

चूल्हेकी जलीहुई मिट्टी और कालीमिरच दोनों समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे। उक्त चूर्णकी नास लेनेसे आधाशीशी ) शिरोरोग शान्त होता है ॥१७॥

अनन्तवातकी चिकित्सा ।

अनन्तवाते कर्त्तव्यः सूर्यावर्त्तहितो विधिः ॥
शिरावेधश्च कर्त्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये ॥
आहारश्च विधातव्यो वातपित्तविनाशनः ॥ १८ ॥

अनन्तवातरोगको शान्त करनेके लिये सूर्यावर्त्तरोगनाशक औषधियोंसे चिकित्सा करनी एवं रोगीको वात-पित्तनाशक भोजन करना और शिरावेध कर रुधिर निकालना चाहिये ॥ १८ ॥

शङ्खककी चिकित्सा ।

सूर्यावर्त्ते हितं यच्च शंखके स्वेदवर्जितम् ।
क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्यं पानं च शंखके ॥ १९ ॥

शङ्खरोगमें स्वेदक्रियाको छोडकर सूर्यावर्त्तमें कहीहुई विधिके अनुसार समस्त-चिकित्सा और क्षीरसर्पि ( मक्खन ) का पान करना तथा नासलेना ॥ १९ ॥