भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१५


शतावरीं कृष्णतिलान्मधुकं नीलमुत्पलम् ।
दूर्वां पुनर्नवां चापि लेपं साध्ववतारयेत् ॥
शीततोयावसेकांश्च क्षीरसेकांश्च शीतलान् ॥ २० ॥

शतावर, काले तिल, मुलहठी, नीलकमल, दूब और पुनर्नवा इन सबको समान भाग लेकर जलमें पीसकर शिरपर लेप करे और शीतल जल तथा शीतल दूधसे शिरपर सेचन क्रिया करे तो शंखरोग दूर होता है ॥ २० ॥

कल्कैश्च क्षीरवृक्षाणां शंखकस्य प्रलेपनम् ।
शंखकरोगमें वड, पीपल, गूलर, पाखर और बेंत आदि क्षीरीवृक्षोंकी छालके कल्कद्वारा लेप करना चाहिये ॥

क्रौञ्चकादम्बहंसानां शरायोः कच्छपस्य च ।
रसैः सुविहितस्याथ तस्य शंखकसन्धिजाः ॥
ऊर्ध्वास्तिस्रः शिराः प्राज्ञो भिन्द्यादेव न ताडयेत् २१

बगला, हंस, कलहंस, शराल ( पक्षीविशेष ) और कछुआ इनके मांसरसका पान कराकर रोगीको पुष्ट करके शंखसन्धिका उपरकी तीन शिराओंको वेधना चाहिये किन्तु उसको तोडना नहीं चाहिये ॥ २१ ॥

गिरिकर्णीफलरसं मूलं च नस्यमाचरेत् ।
मूलं वा बन्धयेत्कर्णे शीघ्रं हन्ति शिरोव्यथाम् ॥ २२ ॥

अपराजिताके फलोंके रस अथवा उसकी मूलके रसद्वारा नास लेवे किम्वा उक्त औषधिकी जडको कानमें बांध देवेतो शिरका दर्द शीघ्र नष्ट होता है ॥ २२ ॥

नागरकल्कविमिश्रं क्षीरं नस्येन योजितं पुंसाम् ।
नानादोषोद्भूतां शिरोरुजां हन्ति तीव्रतराम् ॥ २३ ॥

सोंठको दूधमें पीसकर नस्य लेनेसे अनेक दोषोंसे उत्पन्नहुई दारुण शिरकी पीडा तत्काल शमन होती है ॥ २३ ॥

शिरोबस्ति ।

आशिरो व्यायतं चर्म कृत्वाऽष्टाङ्गुलमूच्छितम् ।
तेनावेष्ट्य शिरोऽधस्तान्माषकल्केन लेपयेत् ॥ २४ ॥
निश्चलस्योपविष्टस्य तैलैः कोष्णैः प्रपूरयेत् ।
धारयेदारुजः शान्तेर्यामं यामार्द्धमेव वा ॥ २५ ॥