भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१७
कुष्ठं मधु कणा शुण्ठी गोक्षुरं कृमिनाशनम् । दशमूलं च प्रत्येकं तोलकं वस्त्रपेषितम् ॥ ३२ ॥ क्वाथेन दशमूल्याश्च यथास्वं परिभावयेत् । घृतयोगात्प्रकर्त्तव्या माषिका वटिका शुभा ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा चार तोले, शुद्ध गन्धक चार तोले, लोहभस्म चार तोले, ताम्रभस्म चार तोले, शुद्ध गूगल सोलह तोले, त्रिफलेका चूर्ण ८ तोले, एवं कूठ, शहद, पीपल, सोंठ, गोखरू, वायविडङ्ग और दशमूल ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । सबको एकत्र कूटपीस और वस्त्रमें छानकर दशमूलके क्वाथमें सात बार भावना देवे । फिर घृतमें मिलाकर एक एक मासेकी सुन्दर गोलियाँ बना लेवे ॥ ३१–३३ ॥
छागीदुग्धानुपानेन पयसा मधुनाऽथवा । शिरःशूलाद्रिवज्रोऽयं चण्डनाथेन भाषितः ॥ ३४ ॥ एकजं द्वन्द्वजं चैव त्रिदोषजनितं तथा । वातिकं पैत्तिकं सर्वं शिरोरोगं विनाशयेत् ॥ ३५ ॥
प्रतिदिन प्रातःसमय १-१ गोली बकरीके दूध या जल अथवा शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । इस शिरःशूलाद्रिवज्रनामक रसको श्रीचण्डनाथने निर्माण किया है । यह एकदोषज, द्विदोषज, त्रिदोषज तथा वात, पित्त, कफ इनसे उत्पन्नहुए सर्व प्रकारके शिरोरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
महालक्ष्मीविलास ।
लौहमभ्रं विषं मुस्तं फलत्रयकटुत्रयम् । धुस्तूरं वृद्धदारं च बीजमिन्द्राशनस्य च ॥ ३६ ॥ गोक्षुरकद्वयं चैव पिप्पलीमूलमेव च । एतत्सर्वं समं ग्राह्यं रसो धुस्तूरकस्य च ॥ ३७ ॥ भावयित्वा वटी कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । महालक्ष्मीविलासोऽयं सन्निपातनिवारकः ॥ ३८ ॥
लोहा, अभ्रक, मीठातेलिया, नागरमोथा, त्रिफला, त्रिकुटा, धतूरा, विधारा भाँगके बीज, गोखुरू, बडा गोखुरू और पीपलामूल इन सबको समान भाग लेकर धतूरेके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे । यह महालक्ष्मीविलासरस यथाविधि सेवन करनेसे त्रिदोषज शिरोरोग नष्ट होय ॥
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